Saturday, 21 February 2026

Sanjeev Khudshah receives the degree of "Doctorate"

संजीव खुदशाह को मिली "पीएचडी" की उपाधि 

श्री संजीव खुदशाह को श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल विश्वविद्यालय भिलाई से पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में "समाचार पत्रों में महिला अपराधियों से संबंधित खबरों का विश्लेषणात्मक अध्ययन रायपुर से प्रकाशित दैनिक भास्कर एवं नवभारत के विशेष संदर्भ में" विषय पर पीएचडी कि उपाधि प्रदान की गई। यह शोध कार्य गाइड डॉ. धनेश जोशी के निर्देशन में पूर्ण किया है। 
संजीव खुदशाह रायपुर तहसील में पटवारी के पद पर पदस्थ हैं। इससे पहले उन्होंने कमिश्नर लैंड रिकॉर्ड के लिए क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट सॉफ्टवेयर बनाया था जो कि आज भी उपयोग किया जा रहा है। इस पीएचडी के लिए उन्हे अपने उच्च अधिकारियों का मार्गदर्शन, सहकर्मियों, शुभ-चिंतकों का विश्वास और माता-पिता का आशीर्वाद होना बताया है। वे साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान भी रखते हैं। सामाजिक और शैक्षणिक विषय पर लिखते रहे हैं।

Saturday, 14 February 2026

Know how valuable your vote


जानिए कितना बहुमूल्य है आपका वोट

संजीव खुदशाह
भारत के ग्रामीण मतदाताओं में वोट के प्रति जागरूकता शहरी मतदाताओं के वनिस्पत कुछ ज्यादा होती है। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत ज्यादा होता है और शहर के क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत कम होता है। इसके कुछ कारण हैशहरी मतदाता पढ़ा लिखा सक्षम होने के बावजूद कुछ भ्रम पाले हुए रहता है। जिसके कारण वह वोट डालने नहीं जाता है आइए जाने वह कौन कौन सी वजह है।
उसे यह भ्रम होता है कि- मैंने अगर वोट नहीं दिया तो क्या होगा सभी लोग वोट देंगे मेरे एक वोट से कुछ होने जाने वाला नहीं है।
कई बार उसकी सोच रहती है कि उस दिन डिसाइड करेंगे वोट देना है या नहीं। समय मिला तो वोट देंगे नहीं मिला तो नहीं देंगे। आलस्य के भावना।
कुछ उल्‍झन का बहाना होता है जैसेमुझे मालूम नहीं है कहां पर वोट देने जाना है। मतदाता सूची में मेरा नाम है या नहीं?

कभी वह अहंकारी हो जाता है सोचता है कि वोट देने चला भी जाऊंगा तो मेरे जैसा व्यक्ति जिंदगी में कभी भी लाइन में खड़ा नहीं हुआ है। मैं लाइन में क्यों खड़े हो ऊंगा।
संकोच करता है मुझे किससे पूछना है कि मेरा मतदान केंद्र कहां पर है। सूची में कहां पर मेरा नाम है। इसके संकोच के कारण शहरी लोग वोट देने नहीं जा पाते हैं।
जबकि मतदान संबंधी पूरी जानकारी चुनाव आयुक्‍त द्वारा इस वेबसाइट में मुहैया कराई गई है कोई भी व्‍यक्ति अपने नाम मतदान केन्‍द्र वोटर आई डी की जानकारी आसानी से ले सकता है1
पूरे देश के किसी भी राज्‍य के लिए https://eci.nic.in/eci_main1/Linkto_erollpdf.aspx,
इन तमाम कारणों से वह वोट देने नहीं जाता है। और फिर बाकी के 5 साल कोसता रहता है अपने ही प्रतिनिधियों कोकि वह फलां काम नहीं करते हैं। उन्होंने यह काम गलत किया है। और ऐसा होना चाहिए था। गलत आदमी चुना गया। जबकि वह स्‍वयं वोट न देकर अपनी जिम्‍मदारी नही निभाता है।
राजनीतिक पार्टी शहरी मतदाताओं को प्रेरित करने में उदासीनता
ज्यादातर ऐसा माना जाता है कि शहरी पढ़ा लिखा मतदाता अपने विवेक और ज्ञान का प्रयोग करके मत दान देते हैं। और किसी भी लालच जैसे दारू साड़ी कपड़ा आदि में ना आकर विवेक के आधार पर वोट देना पसंद करते हैं। इस कारण राजनीतिक पार्टियां शहरी मतदाताओं को वोट डालने के लिए ज्यादा प्रेरित नहीं करती है। क्योंकि ग्रामीण मतदाताओं के वनिस्पत शहरी मतदाताओं के पास उम्मीदवारों के संबंध में ज्यादा जानकारी होती है।
शहरी मतदाताओं में अवेयरनेस जागरूकता की कमी
ज्यादातर यह माना जाता है कि शहरी मतदाता जागरूक होता है। लेकिन सोशल मामलों में या कहें मतदान के मामलों में शहरी मतदाताओं में अवेयरनेस की कमी होती है। ज्यादातर पॉश इलाकों में मतदान का प्रतिशत बेहद कम होता हैजहां पर बुद्धिमान और रसूख वाले लोग बसते हैं। वहीं दूसरी ओर शहर के ही स्लम और झुग्गी झोपड़ी वाले एरिया में मतदान का प्रतिशत अधिक होता है।
चुनाव आयुक्‍त जागरूकता मुहिम
चुनाव आयुक्‍त के द्वारा मतदान के प्रति मतदाता की रूची बढाने के लिए विज्ञापन फलैक्‍स नुक्‍कड नाटक रैली का प्रयोग किया जा रहा हैऔर मतदान हेतु प्रेरीत करने में कोई कसर नही छोड़ी जा रही  है।
आपका एक वोट क्या क्या कर सकता है
कुछ मतदाता यह समझते हैं कि उनके एक वोट देने नहीं देने से क्या फर्क पड़ेगा। दरअसल उनका एक वोट जितने उम्मीदवार खड़े हैं। उन सभी को प्रभावित करता है। मान लीजिए 15 उम्मीदवार हैं। तो आपका एक वोट जिसे आप दे रहे हैं उसे आगे बढ़ाए गा और इतनी ही संख्या में वोट बाकी  उम्मीदवारों से कम हो जाएंगे। क्‍योकि वोट की संख्‍या निश्चित होती है।
आपने अपना वोट नहीं दिया तो क्या होगा
यदि आपने अपना वोट नहीं दिया है तो एक गलत उम्मीदवार चुना जा सकता है। एक अच्छा उम्मीदवार चुनने से महरूम हो सकता है। योग्‍य उम्‍मीदवार आपकी समस्‍याओं को समझ सकता हैजनहीत के मुद्दो को शासन के समक्ष उठा सकता है। वहीं यदि कोई भ्रष्‍ट उम्‍मीदवार विजयी होता है तो वह जन विरोधी  कार्य करेगाजनता को आपस में लड़वायेगादंगे करवायेगाजनता द्वारा जमा किये टैक्‍स के पैसे का दुरुपयोग करेगा, अपन घर भरेगा। यदि आप अपना वोट नोटा को भी देते हैं तो भी यह संदेश जाता है कि मौजूदा उम्मीदवारों में से कोई भी आपको पसंद नहीं है। लोकतंत्र में आपको हर प्रकार से अपनी बात को रखने का मौका मिलता है और वोटिंग या चुनाव प्रथा लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जब जब पढ़ा-लिखा और समझदार मतदाता मत डालने के लिए भारी संख्या में निकलता है तो लोकतंत्र में अप्रत्याशित परिणाम आते हैं। आईये हम भारत के एक एक मतदाता यह सुनिश्चि‍त करे की वे अपना वोट जरूर दे और भारतीय लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान करे।     

       

शनि शिंगणापुर और हाजी अली में प्रवेश पर महिलाओं के संघर्ष का सच

 

शनि शिंगणापुर और हाजी अली में प्रवेश पर महिलाओं के संघर्ष का सच


संजीव खुदशाह
सन 1645 के आस पास शिंगणापुर गांव के पारस नाले में एक शिला बहकर आई और एक दिवा स्वप्न के आधार पर उस शिला को शनि के रूप में पूजा जाने लगा। जो बाद में शनि
शिंगणापुर के नाम से प्रसिध्द हुआ। इसी प्रकार स्वप्न को आधार बताते हुये मूर्ति मिलना उसपर मंदिर निर्माण होना भारत में कोई नई घटना नही हैसत्य कथा एवं टीवी चैनलों में ऐसे समाचार आते रहते है। शनि शिंगणापुर इस लिए चर्चा में नही है कि उसकी शिला किसी पारस नाम के नाले में मिली बल्कि वह इस वजह से चर्चा में है क्योंकि उसकी पूजा करने की चेष्टा एक महिला ने की है। चर्चित होने का कारण भी  किसी आश्चर्य से कम नहीउस पर भी चर्चा का मुद्दा ये की बराबरी के लिए महिलाएं शनि मंदिर में प्रवेश का प्रयास करना चाहती है। जो अधिकार उसे संविधान ने दिया है। कोई ये नही बता रहा है कि देश में उससे भी प्राचीन शनि मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पूजा पर कोई रोक टोक नही है।
ठीक यही कहानी हाजी अली दरगाह की भी है पूरा देश जानता है कि ज्‍यादातर दरगाह में महिलाओं का प्रवेश एक आम बात है। मगर इसके पहले यह जानना दिलचस्प है कि दरगाह के संचालकों ने इस बात की साफ अनदेखी की है कि अजमेर शरीफ का बहुचर्चित दरगाह- जहां पर हिंदू और मुसलमानदोनों लाखों की तादाद में हर साल पहुंचते हैं- वहां पर ऐसी कोई पाबंदी कभी नहीं रही है और न ही मुंबई के माहिम में स्थित मखदूम शाह की दरगाह पर ऐसा कोई प्रतिबंध है। यहां बनी मजार तक महिलाएं बिना रोक-टोक पहुंचती हैं। लेकिन हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश पर पाबंदी है। कुछ मुस्लिम महिलाये प्रवेश हेतु आंदोलन कर रही है। यहां भी मुद्दा वही बराबरी का है। मजेदार बात ये है की दोनो संघर्ष एक ही समय में चालू किये गये। दोनो संघर्षो में कुछ समानताएं भी है।
शनि शिंगणापुर की घटना को कतिपय प्रगतिशील हिन्दु  इसे महिलाओं का ऐतिहासिक आंदोलन बता रहे है वे कहते है कि महिला अपने हक के लिए लड़ रही है। वे उनकी पीठ थप-थपाने का कोई भी मौका हांथ से गवांना नही चाहते।
दरअसल शनि शिंगणापुर में इस आंदोलन से पूर्व एक रोचक घटना घटी एक महिला ने 28 नवंबर 2015 को शनि चबुतरे में चढ़कर शनि की पूजा अर्चना की थी। CCTV फुटेज से ये मामला सामने आया और विवाद बढ़ने लगा। मंदिर ट्रस्ट ने अपने सेवादारों को निलंबित कर दिया और ये माना की शनि शिला अशुध्द हो गई। दूसरे दिन कई टन दूध से उस मंदिर को धोकर पुन: अभिषेक किया गया। यह भारत की हिन्दू महिला के लिए सबसे शर्म का दिन था। यहां बताना अत्यंत जरूरी है कि 28 नवंबर को महात्मा फुले की पुन्यतिथी भी है। प्रश्न उठना लज़मी है की क्या वह महिला महात्मा फूले के विचार से प्रेरित थी। या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक है। दरअसल जो लोग महात्मा  ज्योतिबा के विचार से परिचित है वे जानते है कि त्योतिबा ने समानता के हक के लिए कभी भी मंदिर जाने की बात नही कहीवे समानता के लिए स्कूल जाने की बात कहते थे। शनि शिगणापुर मंदिर प्रवेश को लेकर आंदोलन कर रही भूमाता ब्रिगेड की मुखिया श्रीमती तृप्ति देसाई के बारे में बतादू की वे अन्ना की शिष्या है वे अन्ना के विभिन्न आंदोलनो में उनके साथ देखी गई। वैसे उनका खास बौध्दिक बेकग्राउण्डक क्या है बतना कठिन है। लेकिन ऐसे वक्त  जब छत्तीसगढ़ में सी आर पी एफ के जवानो द्वारा  आदीवासी महिलाओं के स्तन निचोड़कर यह देखा जा रहा है की वे शादी शुदा है या नहीजब हर घंटे एक दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा होद्रोणाचार्य रूपी व्यवस्था द्वारा छात्र रोहित का गला घोटा जा रहा हो ऐसे समय इन मुद्दो पर मौन रहते हुये कुछेक महिलाओं का मंदिर मजार प्रवेश हास्या‍स्पद लगता है। उस पर भी इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा इन्हे  हाथो हाथ लेना प्रायोजि‍त जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है की मंदिर प्रवेश का आंदोलन दरअसल मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश मात्र है। ताकि रोहित वेमुलाआदिवासी महिलाओंदलितों अल्पसंख्यको के मुद्दो से ध्यान भटकाया जा सके। क्योकि मंदिर आंदोलन इससे पहले भी हो चुके हैखुद डॉं अंबेडकर ने दलितों शूद्रों के लिए मंदिर प्रवेश आंदोलन किया था लेकिन मकसद पूजा नही समानता का था। दरअसल डॉं अम्बेडरमहात्‍मा फूले जैसे तमाम समतावादी विचारक यही मानते थे । की जो धर्म तुम्हे नीच और पतीत कहे वो तुम्हारा हो ही नही सकता। तुम उसका बहिष्कार करो। यदि भू माता ब्रिगेड की महिलाये ये किसी वैचारीक आंदोलन से प्रेरित होती तो इस व्यवस्था का बहिष्कार करती। लेकिन वे मंदिर प्रवेश एवं पूजा का अधिकार चाहती है। जिसे प्रवेश उन्हे प्रायेाजित कार्यक्रम के अनुसार देर सवेर दिया जाना ही है। वैसे भी बढती वैज्ञानिकता और समतावादी विचारधारा ने महिला वर्ग को जागृत किया है ऐसे वक्‍त अपनी तुछ परंपराओं को जीवित रखने के लिए प्रवेश देना उनकी मजबूरी है।
बेहतर होता महिलाएं अपने मानव होने के अधिकार को मांगती उनके स्पर्श से अशुध्द होने वालो का बहिस्कार करतीवे उन ग्रंथो को प्रति‍बंध लगाने की मांग करती जो उन्हे‍ नरक का द्वार कहतीपशु का दर्जा देती। वे ऐसी किताबो को मानने से इनकार करती जो उसे इद्दत की मुद्दत तथा हलाला  के लिए मजबूर करती। 

राष्ट्रीय समाचार पत्र देशबंंधु में प्रकाशित

 

book review black word classes in modern India

भारत की वर्ण और जाति व्यवस्था.... पुस्तक समीक्षा


शुरुआत मानव उत्पत्ति पर विचार करते हुए की गई है। खुदशाह ने इस हेतु धर्मशास्त्रों में मानव उत्पत्ति को लेकर व्याख्यायित मान्यताओं को सम्मिलित किया है। हिंदू, ईसाई (सृष्टि का वर्णन)और इस्लाम (सुरतुल बकरति, आयत् सं. 30 से 37) को भी उद्धृत कर अंत में वैज्ञानिक मान्यताओं के अंतर्गत स्पष्ट किया है कि मानव उत्पत्ति करोड़ों वर्ष के सतत् विकास

का परिणाम है। इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानव उत्पत्ति के प्रश्नों को जिस तार्किक और तथ्यपूर्ण ढंग से लेखक ने पाठकों के समक्ष रखा है, वह एक नई दृष्टि देता है। फिर भी आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग। पुस्तक की शुरुआत अगर मानव उत्पत्ति के प्रश्नों को सुलझाते हुए नहीं भी की जाती तो भी पुस्तक का मूल उद्देश्य प्रभावित नहीं होता।

चूंकि भारत में जातीय प्रथा होने के कारण मानव का शोषक या शोषित होना या शासक या शासित होना धार्मिक व सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण है, इसलिए लेखक श्री संजीव ने पिछड़े वर्ग की पहचान करने के लिए हिंदूधर्म शास्त्रों, स्मृतियों सहित कई विद्वानों के मतों को खंगाला और उद्धृत किया है।
चार अध्यायों में समाहित यह पुस्तक पिछड़े वर्ग से संबंधित अब तक बनी हुई अवधारणाओं, मिथक तथा पूर्वाग्रह जो बने हुए हैं उनकी पहचान कर पाठकों के सामने तर्क संगत ढंग से मय तथ्यों के वास्तविकताएं रखती है। जैसे आज का पिछड़ा वर्ग हिंदूधर्म के चौथे वर्ण 'शूद्र' से संबंधित माना जाता है। किंतु खुदशाह के इस शोध प्रबंध से स्पष्ट होता है कि आधुनिक भारत का पिछड़ा वर्ग मूलरूप से आर्य व्यवस्था से बाहर के लोग हैं। शूद्र वर्ण के नहीं। यह अलग बात है कि बाद में इनका शूद्रों में समावेश कर लिया गया। लेखक ने इसे स्पष्ट करने से पूर्व शूद्र वर्ण की उत्पत्ति और उसके विकास को रेखांकित किया है। उनके अनुसार आर्यों में पहले तीन ही वर्ण थे। लेखक ने ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण और तैत्तरीय ब्राह्मण सहित डॉ. अम्बेडकर के हवाले से कहा है कि यहे तीनों ग्रंथ आर्यों के पहले ग्रंथ हैं और केवल तीन वर्णों की ही पुष्टि करते हैं। (पृष्ठ-26) वैसे ऋग्वेद के अंतिम दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में चार वर्णों का वर्णन है किंतु उक्त दसवें मंडल को बाद में जोड़ा हुआ माना गया है।

शूद्रों के उद्भव पर प्रकाश डालते हुए खुदशाह ने दोहराया है कि सभी पिछड़े वर्ग की कामगार जातियां अनार्य थीं, जो आज हिंदूधर्म की संस्कृति को संजोए हुए हैं। क्योंकि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन सूचियों में अवैध संतान घोषित नहीं किए गए हैं (पृष्ठ-30) वह लिखते हैं—"यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनु ने शूद्र को उच्च वर्णों की सेवा करने का आदेश दिया है, किंतु इन सेवाओं में ये पिछड़े वर्ग के कामगार नहीं आते। यानि पिछड़े वर्ग के कामगारों के कार्य उच्च वर्ग की प्रत्यक्ष कोई सेवा नहीं करते। जैसा कि मनु ने कहा है—शूद्र उच्च वर्ग के दास होंगे। यहां दास से संबंध उच्च वर्णों की प्रत्यक्ष सेवा से है। वह आगे लिखते हैं—उक्त आधारों पर कहा जा सकता है कि 1. शूद्र कौन और कैसे में दी गई व्याख्या के अनुसार क्षत्रियों की दो शाखा सूर्यवंशी तथा चंद्रवंशी में से सूर्यवंशी अनार्य थे, जिन्हें आर्यों द्वारा धार्मिक, राजनीतिक समझौते द्वारा क्षत्रिय वर्ण में शामिल कर लिया गया।
2. बाद में इन्हीं सूर्यवंशीय क्षत्रियों का ब्राह्मणों से संघर्ष हुआ जिसने इन्हें उपनयन संस्कार से वंचित कर दिया। इसी संघर्ष के परिणाम से नए वर्ग की उत्पत्ति हुई, जिसे शूद्र कहा गया। ये ब्राह्मण वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत आते थे। यहीं से चातुर्वर्ण परंपरा की शुरुआत हुई। शूद्रों में वे लोग भी सम्मिलित थे जो युद्ध में पराजित होकर दास बने फिर वे चाहे आर्य ही क्यों न हों। अत: शूद्र वर्ण आर्य-अनार्य जातियों का जमावड़ा बन गया।
शेष कामगार (पिछड़ा वर्ग) जातियां कहां से आईं। यह निम्न बिंदुओं के तहत दिया गया है।
1. यह जातियां आर्यों के हमले से पूर्व से भारत में विद्यमान थीं, सिंधु घाटी सभ्यता के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि उस समय लोहार, सोनार, कुम्हार जैसी कई कारीगर जातियां विद्यमान थीं।
2. आर्य हमले के पश्चात इन कामगार पिछड़ेवर्ग की जातियों को अपने समाज में स्वीकार करने की कोशिश की, क्योंकि
(अ) आर्यों को इनकी आवश्यकता थी क्योंकि आर्यों के पास कामगार नहीं थे।
(ब) आर्य युद्ध, कृषि तथा पशु पालन के सिवाय अन्य किसी विद्या में निपुण नहीं थे।
(स) आर्य इनका उपयोग आसानी से कर पाते थे, क्योंकि ये जातियां आर्यों का विरोध नहीं करती थीं चूंकि ये कामगार जातियां लड़ाकू न थीं।
(द) दूसरे अन्य राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी असुर, डोम, चांडाल जैसी अनार्य जातियां जो आर्यों का विरोध करती थीं आर्यों द्वारा कोपभाजन का शिकार बनीं तथा अछूत करार दी गईं।
3. चूंकि कामगार अनार्य जाति शूद्रों में गिनी जाने लगीं। इसलिए सूर्यवंशी अनार्य क्षत्रिय जातियों के साथ मिलकर शूद्रों में शामिल हो गई। (पृष्ठ-31-32)
अभी तक यह अवधारणा थी कि शूद्र केवल शूद्र हैं, किंतु आर्यों ने शूद्रों को भी दो भागों में विभाजित किया हुआ था। एक अबहिष्कृत शूद्र, दूसरा बहिष्कृत शूद्र। पहले वर्ग में खेतिहर, पशुपालक, दस्तकारी, तेल निकालने वाले, बढ़ई, पीतल, सोना-चांदी के जेवर बनाने वाले, शिल्प, वस्त्र बुनाई, छपाई आदि का काम करने वाली जातियां थीं। इन्होंने आर्यों की दासता आसानी से स्वीकार कर ली। जबकि बहिष्कृत शूद्रों में वे जातियां थीं, जिन्होंने आर्यों के सामने आसानी से घुटने नहीं टेके। विद्वान ऐसा मानते हैं कि ये अनार्यों में शासक जातियों के रूप में थीं। आर्यों के साथ हुए संघर्ष में पराजित हुईं। इन्हें बहिष्कृत शूद्र जाति के रूप में स्वीकार किया गया। इन्हें ही आज अछूत (अतिशूद्र) जातियों में गिना जाता है।

जिस तरह शूद्रों को दो वर्गों में बांटा गया है। संजीव ने कामगार पिछड़े वर्ग(शूद्र) को भी दो भागों में बांटा है—(1) उत्पादक जातियां (2) गैर उत्पादक जातियां। किंतु पिछड़े वर्ग में जिन जातियों को सम्मिलित किया गया है उसमें भले ही अतिशूद्र (बहुत ज्यादा अछूत) जातियों का समावेश न हो किंतु उत्पादक व गैर उत्पादक दोनों तरह की जातियों को पिछड़ा वर्ग माना गया है। चौथे अध्याय (जाति की पड़ताल एवं समाधान) में पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित जातियों की जो आधिकारिक सूची दी है। उसमें भी यही तथ्य है। जैसे लोहार, बढ़ई, सुनार, ठठेरा, तेली (साहू) छीपा आदि यह उत्पादक कामगार जातियां हैं। जबकि बैरागी (वैष्णव) (धार्मिक भिक्षावृत्ति करने वाली) भाट, चारण (राजा के सम्मान में विरुदावली का गायन करने वाली) जैसी बहुत-सी गैर जातियां हैं। पिछड़े वर्ग में उन जातियों को भी सम्मिलित किया गया है। जो हिंदूधर्म में अनुसूचित जाति के तहत आती होंगी। किंतु बाद में उन्होंने ईसाई तथा मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया; लेकिन धर्मांतरण के बाद भी उनका काम वही परंपरागत रहा। जैसे शेख मेहतर (सफाई कामगार) आदि।

पिछड़े वर्ग की पहचान के बाद भी वह दूसरे अध्याय—'जाति एवं गोत्र विवाद तथा हिंदूकरण' में पिछड़े वर्ग की उत्पत्ति के बारे में स्मृतियों, पुराणों के मत क्या हैं, उसे पाठकों के सामने रखते हैं। क्योंकि पिछड़े वर्ग की कुछ जातियां अपने को क्षत्रिय और ब्राह्मण होने का दावा करती रही हैं। लेखक ने उसके कुछ उदाहरण भी दिए हैं किंतु हम भी लोकजीवन में कई ऐसी जातियों को जानने लगे हैं, जिनका कार्य धार्मिक भिक्षावृत्ति या ग्रह विशेष का दान ग्रहण करना रहा है। सीधे तौर पर अपने आप को ब्राह्मण बतलाती हैं तथा शर्मा जैसे सरनेम ग्रहण कर चुकी हैं। आज वे पिछड़े वर्ग की आधिकारिक सूची में दर्ज हैं। जबकि हिंदू स्मृतियां उन्हें वर्णसंकर घोषित करती हैं और इन्हीं वर्ण संकर संतति से विभिन्न निम्न जातियों का उद्भव हुआ बताती हैं।

पिछड़े वर्ग की जो जातियां स्वयं को क्षत्रिय या ब्राह्मण होने का दावा करती हैं, लेखक ने उनमें मराठा, सूद और भूमिहार के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। किंतु उच्च जातियों ने इनके दावों को कभी भी स्वीकार नहीं किया। यहां शिवाजी का उदाहरण ही पर्याप्त होगा। मुगलकाल में मराठा जाति के शिवाजी ने अपनी वीरता से जब पश्चिमी महाराष्ट्र के कई राज्यों को जीत कर उन पर अपना अधिकार जमा लिया और राज तिलक कराने की सोची तब ब्राह्मणों ने उनका राज्याभिषेक कराने से इंकार कर दिया तथा तर्क दिया कि वह शूद्र हैं। इस अध्याय में गोत्र क्या है? तथा अनार्य वर्ग के देव-महादेव का कैसे हिंदूकरण करके बिना धर्मांतरण के अनार्यों को हिंदू धर्म की परिधि में लाया गया की विद्वतापूर्ण विवेचना की गई है। इस में बुद्ध के क्षत्रिय होने का जो मिथक अब तक बना हुआ था, वह भी टूटा है और यह वास्तविकता सामने आई कि वे शाक्य थे। और शाक्य भारत में एक हमलावर के रूप में आए। बाद में ये जाति भारतीयों के साथ मिल गई और यह जाति शूद्रों में शुमार होती थी। (देखें पृष्ठ-71-72)

अध्याय-तीन विकास यात्रा के विभिन्न सोपान में लेखक ने उच्च वर्गों के आरक्षण को रेखांकित किया तथा पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की पृष्ठभूमि को भी वर्णित करते हुए लिखा है कि—"जब हमारा संविधान बन रहा था तो हमारे पास इतना समय नहीं था कि दलित वर्गों में आने वाली सभी जातियों की शिनाख्त की जा सकती और उन्हें सूचीबद्ध किया जाता। अन्य दलित जातियों (पिछड़ा वर्ग की जातियां) की पहचान और उसके लिए आरक्षण की व्यवस्था करने के लिए संविधान में एक आयोग बनाने की व्यवस्था की गई। उसी के अनुसरण में 29 जनवरी 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया गया। यह प्रथम पिछड़े वर्ग आयोग का गठन था। किंतु इस आयोग ने इन जातियों की भलाई की अनुशंसा करने के बजाए ब्राह्मणवादी मानसिकता प्रकट की जिससे पिछड़ों का आरक्षण खटाई में पड़ गया। बाद में 1978 में मंडल आयोग बना जिसे लागू करने का श्रेय वी.पी.सिंह को गया।'' संजीव ने पिछड़ेवर्ग को आरक्षण देने के विषय और उसके विरोध की व्यापक चर्चा की है।
लेखक कई ऐसे प्रश्न खड़े करते हैं जिनका उत्तर जात्याभिमानी लोगों को देना कठिन है। इस अनुपम कृति के लिए लेखक बधाई ।
राजेंद्र प्रसाद ठाकुर 
राष्ट्रीय प्रधान महासचिव 
महामुक्ति संघ

 

अमेरिका की लाजवाब सुरक्षा नीति पर हाय तौबा क्यूं ?


अमेरिकी हवाई अड्डा में ''माई नेम इजशाहरूख खान`` शाहरूख खान के ये स्टाईलिश बोल सुरक्षा हेतु लगे कम्प्युटर को नागवार गुजरे और कम्प्युटर ने सुरक्षा अधिकरियों को गहन जांच के आदेश दे दियें लगभग दो घंटे तक शाहरूख खान को जांच हेतु रोके रखा बाद में पूरी संतुष्टि पश्चात छोड़ दिया। इस पर भारतीय मीडिया ने खूब हाय तौबा मचाईं शाहरूख खान न हुए भारत के बादशाह हो गये। न्यूज चैनलों ने टी आर पी बढ़ाने को कोई भी मौका हाथ से जाने न दिया। शाहरूख की सुरक्षा जांच को भारत की बेइज्जत्ती के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। क्या भारत की इज्जत इतनी सस्ती है कि अभिनेता की सुरक्षा जांच से बेइज्जत हो जाये। जबकि गौरतलब है कि इससे पहले अमेरिका में जसवंत सिंह की जांच के दौरान कपड़े भी उतारे गये तथा कुछ दिन पूर्व पूर्वराष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को भारत में ही अमेरिकी हवाई कम्पनी के सुरक्षा अधिकारियों ने आम आदमी की भाती रेगुलर जांच की ।तब मीडिया की शायद नींद नही खुली रही होगी। लेकिन बाद में कई बुध्दिजीवियों ने इन समस्त जांच पर खूब कड़ी आलोचना की तथा अमेरिका को जी भरकर कोसा भी। उनका मानना है कि व्ही.आई.पी. की जांच उसकी इज्जत से खिलवाड़ है ये जांच नही होनी चाहिए। अमेरिका बार-बार ऐसा करके हमारी इज्जत से खिलवाड़ कर रहा है भारत को चाहिए की उसका विरोध करें।
दरअसल ऐसा सोचने वाले तथा हाय तौबा मचाने वाले लोग उसी पुरानी मानसिकता वाले लोग हैं जो व्ही.आई.पी. को इन्सान बाकि को जानवर समझते है। व्ही.आई.पी. यानी पैसे वाला या हर वो आदमी जो आम आदमी नही है। भारत में हर व्यक्ति सुरक्षा या अन्य किसी भी प्रकार की जांच से बचना चाहते है। एक अदना सा पुलिस का सिपाही को ही देख लिजिए उसकी छोटी सी मोटर सायकल में लिखा होता है। बड़ा सा ''पुलिस``। उद्देश्य एक मात्र सुरक्षा जांच (ट्रफिक जांच भी) से बचनां चाहे पंच होसरपंच होपार्षद होविधायक होया सांसद हो सभी की गाड़ी के नेम प्लेट पर ऐसा चिन्ह जरूर होगा। जो सुरक्षा जांच टीम पर भारी पड़ेगां और वह व्यक्ति जांच से बच जायेगा। जांच से बचा यानी इज्जत बच गई। सिर्फ इज्जत बची ही नही बल्कि इज्जत बढ़ भी जाती है ऐसे जांच से बचने से। देखिये कितनी काम की है ये जांच। तभी तो सारे व्ही.आई.पी. जेड सुरक्षा १-४ के गार्ड की सुरक्षा लेने हेतु जुगत लगाते रहेते है चाहे इसके लिए फर्जी फोन का सहारा ही क्यो न लेना पड़ जाये। आज कर इस फेहरिस्त में क्रिकेट खिलाड़ीअभिनेता भी शामिल हो गये। नेताओं का तो इसमें जन्मजात अधिकार था ही। फिर प्रश्न खड़ा होता है वह नेता नेता ही कैसा जो आम आदमी से असुरक्षित हैवह खिलाड़ी सिर्फ खिलाड़ी तो नही है जिसे सुरक्षा चाहिएं अभिनेता में क्या खोट है जो अपने चाहने वालों से असुरक्षित है।
भारत में बड़ी जबरदस्त परंपरा है जिसकी सुरक्षा में आदमी लगे हो उसकी सुरक्षा जांच नही होती। जब कोई हवाई जहाज से आये तो उसकी जांच नही होती। जब कोई ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे से उतरे तो उसकी जांच नही होती। अगर जांच कि गई तो उस  सुरक्षा अधिकारी की जांच चालू हो सकती है। हो सकता है बाद में उसका स्थानांतरण या निलंबन तक ये जांच चलती रहे। इससे अंदाज लग सकता हे कि कितना निरंकुश है हमारा व्ही.आई.पी. समाज इसी मारसिकता का फायदा आंतक वादियों को मिलता है यही कारण है कि अमेरिका में ९/११/२००१ के बाद एक भी आतंकवादी हमले नही हुए। लेकिन भारत में पूरा कलेण्डर आतंकवादी हमले भरा हुआ है। आखिर क्यूं भारतीय व्ही.आई.पी. सुरक्षा जांच  का सामना करने से कतराता है क्या सिफ अह ंके कारण। कितने ही आतंकवादी भारत में एक व्ही.आई.पी. की तरह प्रवेश हो जाते है। हाल ही में दिल्ली में हुए हमले के सभी आरोपी ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे में सफर करते हुए विस्फोटक सामग्री लेकर आये थे। जो व्ही.आई.पी. सदृश्य होने के कारण जांच से बज गये। बंबई का प्रसिध्द ताज पांच सितारा होटल जिसमें जाने का सपना आम-आदमी देख भी नही सकता। आतंवादी उसमें भी व्ही.आई.पी. बनकर घुस गये। क्योंकि भात में सब कुछ हो सकता है व्ही.आई.पी. की जांच नही हो सकती यह बाद देश के दुश्मन को अच्छि तरह मालुम है। क्योकि इससे व्ही.आई.पी. की इज्जत में बट्टा लग जाता है।
अभि वक्त अमेरिका पर उंगली उठाने का नही हैं। बल्कि उससे सीख लेने का है। यह गहन विचार का बिन्दु है कि टूईन टावर हमले के बाद आज तक अमेरिका में कोई आतंकवादी हमला नही हो सका। उनकी सुरक्षा नीति से हमे सीख लेनी चाहिए। अमेरिका आज विश्व में सर्वश्रेष्ठ है तो हमे भी अपनी आत्ममुग्दधा से बाहर आना चाहिए। उनके सर्वश्रेष्ठता के मापदण्ड को देख कर खुश होना चाहिए। जहां भारत में आम आदमी पर सारे नियम लागु होते है वही व्ही.आई.पी. एवं पुजीपतियों का बोल-बाला बढ़ रहा है। ऐसे में एक सरकारी होहदेदार सरकारी खजाने को चट करने में लगा हुआ। चाहे चारा घोटाला हो या स्टांप घोटाला या हवाला का मामला या फिर सरकारी सम्पतियों का दुरूपयोग का मामला हो। जबकि अमेरिका का राष्ट्रपति को व्हाईट हाउस में रहने एवं अपनी निजी सेवाओं का खर्चा स्वयं वहन करना पड़ता है। अमेरिका में सुरक्षा जांच को महत्व देना प्रतिष्ठित नागरिक गुण माना जाता है। अमेरिका की सुरक्षा नीति ऐसी है जिसमें मंत्रीनेताअफसरराष्ट्रपतिसेलिब्रेटी यहां तक की जज भी जांच के दायरे से बाहर नही है। यहां प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा जांच की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। ताकि कोई भी आतंकवादी गतिविधीयां न हो सके। ऐसी व्यवस्था से मजाल हे कोई चिड़ीया भी पर मार सके।
अब प्रश्न यह उठता है कि भारत में आतंक वाद तथा नक्सलवाद सिर चढ़ कर बोल रहा है। हमारी सुरक्षा व्यवस्था बेमानी हो रही है जो केवल आम आदमी को परेशान करने का सबब बन गई है। तो क्या भारत अमेरिका के विरोध करने में अपनी शक्ति जाया करेगा या उनकी लाजवाब सुरक्षा नीति से कुछ सीख लेने की चेष्टा भी करेगा।

 

विज्ञान को हङपने की कोशिश- ईश्वर कण

·         संजीव खुदशाह 
हिग्स बोसोन की आज दुनिया भर में चर्चा हो रही हैये निश्चित तौर पर ब्रम्हांड को समझने की दिशा में एक बङी उपलब्धि हैपर इसे ईश्वर कण कहना सर्वथा अनुचित है।

हिग्स बोसोन क्या है?
अभी तक हिग्स बोसोन सिर्फ भोतिक शास्त्रियों के मस्तिष्क में ही बसता थाइस बात को लेकर लगभग एक पूरा सिध्दान्त तैयार था कि ब्रम्हांड कैसे काम करता है इसमें वे सभी सूक्ष्म अंश शामिल है जिनमें अणुकण और वे सब बनता है जिसे हम देख सकते है।
वैज्ञानिक लंबे समय से स्विटजरलैड की सर्न प्रयोगशाला में हिग्स बोसोन की खोज में जुटे  हैवैज्ञानिकों ने कहा कि उन्हें एक सूक्ष्माणु मिला हैजो लंबे समय से दुश्प्राप्य हिग्स बोसन से मिलता-जुलता हैएक अभूतपूर्व खोज जो इस बात की व्याख्या कर सकती हैकणों में भार क्यों होता हैतदानुसारब्रह्माण्ड में तारोंग्रहों और अन्य चीजों का अस्तित्व क्यों है।
बुधवार की सुबहजिनेवा की यूरोपियन प्रयोगशाला सीईआरएन में सैकड़ों वैज्ञानिक एकत्र हुएऔर उनसे कहीं ज्यादा लाइव वेबकास्ट पर ये सुनने के लिए एकजुट हुए कि कैसे विशाल हैड्रॉन कोलाइडर के ताज़ातरीन आंकड़े निर्णायक रूप से हिग्स सरीखे कणों की मौजूदगी को लेकर खुलासा करने वाले हैं।
बोसोन नाम के पीछे तथ्य है कि  भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस तथा अलर्बट आईस्टीन ने खास तरह के कणों की विशेषता बताते हुए एक र्फामुला बनाया था। इसलिए इसका नाम बोस+ऑन (Bosons) रखा गया। यह नाम वैज्ञानिक पाल डायराक ने दिया।
फिलहार सर्न के वैज्ञानिक इसे हिग्स बोसोन का नाम देने से बच रहे है।

गाड पार्टिकल कहने पर सर्न के वैज्ञानिकों में नाराजगी

स्वयं हिग्स कण के सिध्दांत का प्रतिपादन करने वाले ब्रिटिश भौतिक वैज्ञानिक प्रोफेसर पीटर हिग्स इस बात पर दुखी है कि अज्ञानता वश धार्मिक लोग इसे "ईश्वर कण" कहकर प्रचारीत कर रहे है। प्रोफेसर पीटर हिग्स 1960 के दशक के उन सिद्धान्तकारों में थेजिन्होंने इसकी मौजूदगी की भविष्यवाणी की थी। वे कहते है कि "मुझे विश्वास नहीं होता कि ये असाधारण खोज मेरे जीते जी हुई,"

हिन्दुवादी संगठन द्वारा लगातार यह प्रयास किया जा रहा है कि किसी प्रकार भारतीय समाज के लोग धर्म कि जकङन से न निकल सके ताकि उनका धंधा निर्बाध रूप से चलता रहे इसलिए भारत कि जनता को गुमराह करने के लिए ऐसे लोग और उनसे सबंधित मीडिया जानबूझकर इस अविष्कार को गाड पार्टिकल कह कर प्रचारित कर रहे है।

हिदुवादियों का कहना है कि 50 हजार करोङ रूपय बेकार बर्बाद कर दिये गये। यहॉ के .ऋषियों मुनियों ने पहले हि खोज निकाला थाकि कण कण में भगवान है। इस प्रकार का प्रचार अन्य धर्मावलंबी भ्री रहे है।

इसे मै यदि आम भाषा में कहावत कहूं तो कहूंगा  "मेहनत करे मुर्गाअंडा खाये फकीर" ।  अब भारतीय मीडिया को ये फकीराना चोला उतारना होगा। हम करते तो कुछ नही बस किसी के अविष्कार को हङपने के लिए तैयार हो जाते।  ये सवर्ण मीडिया अन्ना के मुआमले में विशुध्द वैज्ञानिकवादी बन जाती लेकिन दूसरी ओर विज्ञान के मुआमले में विशुध्द सनातनी। मुझे पी7,  सहारा समय जैसे चैनलो पर आश्चय हुआ कि किस प्रकार दिन रात कण-कण में भगवान कहकर भडकाउ प्रोग्राम पेश कियेजिसमें विज्ञान सम्मत चर्चा कम हिन्दूवाद को परोसने कि कोशिश ज्यादा कि गई।

 

न्याय पर भारी पोथी पुरानी

depicts corruption in cartoon, gets punishment
संजीव खुदशाह
आज कोर्ट द्वारा महत्वपूर्ण दो मुआमलों में दिये गये आदेशों को पढ.ने का मौका मिला। जिसमें से एक काटूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर तथा दूसरा निर्मल बाबा पर है।
बंबई उच्च न्यायलय ने काटूनिस्ट श्री त्रिवेदी को "तुच्छ'' आधार पर ''बिना सोचे समझे'' गिरफतार करने के लिए मुम्बई पुलिस को फटकार लगाई है कोर्ट ने कहा कि पुलिस की कार्यवाही से असीम की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ है।
पुलिस को यह भी बताना होगा कि काटूनिस्ट के खिलाफ राजद्रोह का आरोप कैसे लगाया गया। न्यायधीश डी वाई चंद्रचूण और अहमद सैयद की पीठ ने त्रिवेदी की गिरफतारी को प्रथम द़ष्टया 'मनमने तरीके से की गईकार्यवाही बताते हुए कहाहमारे पास असीम त्रिवेदी है जो अपने आवाज बुलंद करने का साहस रखता है और इसके खिलाफ खङा होता हैलेकिन उन कई लोगो की क्या स्थिति है जिनकी आवाज पुलिस बंद कर देती है आज आपने एक कार्टूनिस्ट पर हमला कियाकल फिल्म निर्माता पर हमला करेगे फिर लेखक पर....... हम एक स्वतंत्र समाज में रहते है और हर व्यक्ति को बोलने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है (पत्रिका दिनांक 15 sep 2012)

गौरतलब है कि मुंबई में हुए अन्ना के आदोलन के दौरान कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने एक कार्टून बनाया था। इस कार्टून में राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह में मौजूद तीन सिंहों की जगह भेड़िए का सिर और 'सत्यमेव जयते' की जगह 'भ्रष्टमेव जयते' लिखा गया। पुलिस ने असीम के खिलाफ राजद्रोह के अलावा आईटी एक्ट, राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न एक्ट और साइबर क्राइम एक्ट के तहत भी केस दर्ज किया है।
इस फैसले से निम्न बाते उभर कर आती है
(1) असीम के कार्टून को प्रकाशित किया जा सकता है। ये कार्टून देश द्रोही की श्रेणी में नही है।
(2) स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति तथा देश द्रोह का फैसला लेने में पुलिस नाकाम रही।
(3) स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति तथा देश द्रोह की धाराओं के बीच सीमा रेखा नष्ट हो गई।
(4) देश द्रोह के इसी तरह के एक मुआमले में तिरंगे पर कमेन्टस करने पर जानी लिवर को स हुई थी तथा सिर्फ घर में हथियार रखने पर संजय दत्त को अपराधी ठहराया गया था।
nirmal-baba 
दूसरा आदेश चर्चित निर्मल बाबा पर है
''दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वयंभू तांत्रिक निर्मल बाबा से कहा कि वह अपने अनुयायियों को बेतुका उपाय नही बताएं। इसके साथ ही अदालत ने एक हिन्दी मीडिया पोर्टल को उनके लिखाफ की गई अपमानजनक सामग्री प्रकाशित करने पर रोक लगा दी है। न्यायधीश कैलाश गंभीर ने 22 प्रष्ठो के आदेश में बाबा के खिलाफ तीखी टिप्पणी की।'(पत्रिका 15 Sep 2012)'
निर्मल सिंह नरूला ऊर्फ निर्मल बाबा का मुआमला चर्चित था एवं देश के बुघ्दिजीवियों को इस फैसले का इन्तजार था। साथ-साथ यह भी आशा कि जा रही थी, कि निर्मल के बहाने टीवी पर दिखाये जाने वाले सभी ठगों की शामत आयेगी एवं इन पर पाबंदी लगा दि जायेगी। लेकिन ऐसा नही हुआ। इस आदेश से निम्न बाते उभरती है-
निर्मल बाबा अपने अनुयायियों को बेतुका उपाय नही बताए। तुक वाले उपाय क्या होगे इसका खुलासा नह किया गया। हो सकता है आदालत की मंशा हो कि  जिस तरह अन्य ठग शास्त्रीय आधार पर उपाय बता रहे है वैसा करे। यानि गुरूवार को किसी ब्राम्हण को उज्वल वस्त्र दान करने से धन प्राप्ति होगी, या शनिवार को किसी भंगी को रात का बासी जूठा भोजन देने से पुण्य प्राप्त होगा रूके काम बनेगे, या सुबह सुबह तेली का मूह न देखे अन्यथा विपत्ति आयेगी। आज प्रतिदिन करोङो का व्यापार इन ठगों द्वारा देश की भोली जनता को डराकर बहकार किया जा रहा है। और जनता अपने जेब कटवाने की शिकायत कहीं कर भी नही पाती क्योकि इन ठगों को उपर से आर्शिवाद जो प्राप्त है।
इन दोनो आदेशों में एक बात सामन रूप से परिलक्षित होती है वह है मनु के विधान का कङाई से पालन।

ब्रम्ह हत्या महा पाप है इससे बचो,
वैदिक शास्त्रीय उपायों पर सरकारी मुहर लगाओ।
देखे मनुस्म़्रति अध्याय 8 एवं 10

 जनमदिन के पोस्टर(छत्तीसगढी व्यंग)

बियंग

संजीव खुदशाह
जब ले मै राईपुर आये रहेउंनेतामन के जनमदिन के पोस्टर ला देख के मोर मन हा कसमसा के रईगीस। मोला लागीस के मै राईपुर नही कोनो नेता के घर मा पहुचगेव। को रे बाबु हमन ई नेता मन ला बोट देके अतके कन गलती करे हनकि हमन अपन लईका के जनम दिन ला भुला जाथन। लेकिन ई नेता मन के जनमदिन के पोस्टर हा साल भर पूरा राईपुर शहर मा चटके रथे। ई मन राजयोग ला पाने वाला पूरा बछर जनम दिन ला मनाथे। का योगी का सन्यासी का अगरावाले का तिवारी सबके जनम दिन के फोटो हा गली गली म चटके रथे। कभु-कभु खुखांर असन इमनके सकल ला देख के नानकन लईका मन डरा घलो जाथे। मै घलो इ नेता मन और उकर चम्मचा के कुटिल हसी वाला फोटु ल देख के चक्कर में पड़ जाथौ। ईमन हास्थे धन कुट रचना करथ हवे। 
एक घौ एक नेता के चम्मच ला पुछैवकईसे रे बाबु भोगी के जनम दिन म तोर फोटु गली गली में चपके रहेयं। कहां ले भिड़ाय हस अईसन कनेक्शन। चममच हा दांत ला निपोरे लागीस। फेर मै कहेव कहां ला पाथस अतके कन  पईसाहमुमन ला बतातेव त जिनगी हा तरजतीस। फेर उ चम्मच हा दांत ला निपोरेकस करीस। मोर गोठ हा ओला गुदगुदी कस लागीस। कनेक्शन के गोठ मा अपन आप ला केबिनेट मिनीस्टर के दर्जा वाला सिमेंट कस सीना ला फुलाय रहे। मोला कथे- हट रे बुढ़उ तै का जानबे इ चिज लाइही ला कथे राजनीति। तुमन का जानहु राजनीति ला बस धान ला बोथौ- बासी ला खाथौ। इ ला कथे बोआईचुनाव होही तेकर बाद किये जाही लुआई। ही ही हांसे लागीस। फेर मै हा पुछेव बुआई में कतेकन खरचा आईस- चम्मच हा मोर बर भड़कगेलेकिन कुटिल हसीं मां दात ला दबा के कथे- देड़ करोड़। देड़ करोड़ के खर्चा जनम दिन म सुन के मोर होश उड़ागे रहय। लेकिन कइसनो हिम्मत करके मै हा पुछेव - लुआई म का होही। फेर उ चम्मच हा दांत ला निपोर के किहीस दलाली मिलही देड़ अरब के। अब मै चुप हो गेवभागे के रद्दा ला खोजत रहेव। अईसन खेती मोर पुरखा तक नई जानय। मै भागे के चालु करेवकभु ओ गली- कभु ई गली। जहां मै जातेवइही मन के फोटु हा चपके रहेय। ई मन के बोआई म मै धान कस टुकुर-टुकुर देखत खड़े रहेव।

 

दलित कहानी - मेहतर का घर है.


दलित कहानी
मेहतर का घर है
संजीव खुदशाह

अमित श्रीवास्तव ने चाय की चुस्की लगाई और आर.एल.समुन्द की ओर मुखातीब होते हुए गहरी सांस भरकर कहने लगे- ‘‘यार एक स्टेटस के बाद तो जातपात सब खत्म हो जाता है।’’ आर.एल.समुंद के पास कोई शब्द नही था इस वाक्य का जवाब देने के लिए क्योकि कई बार इस मुद्दे पर लम्बी बहस हो चुकी थी। अमित श्रीवास्तव यही सिध्द करने की कोशिश करते की एक बार आरक्षण का लाभ लेकर सवर्णो की बराबरी करने के बाद जाति का महत्व खत्म हो जाता है और ऐसे परिवार को आरक्षण का अधिकार खत्म कर देना चाहिए। लेकिन श्री समुंद उन्हे बताते कि वर्ग बदलने से जाति खत्म नही होती। जाति का कलंक तो साथ चलता है। जब कलंक नही मिटाभेदभाव नही मिटातो आरक्षण एवं अन्य सुविधाएं क्यों खत्म हो। लेकिन अमित श्रीवास्तव अड़ जाते ‘‘बस यही तुम लोगों की ओछी सोच है। आरक्षण पा कर हमारे बराबर तो आ गये हो लेकिन सोच में आरक्षण कहा इसलिए दकियानूसी विचारधारा है तुम्हारी।’’ वे तैश में आ जाते और जोर देकर कहते- ‘‘तुम जैसे व्यक्तियों के व्दारा आरक्षण का लाभ बार-बार लेने के कारण ही तो तुम्हारा बाकी समाज पिछड़ा है तुम्हे तो चाहिए की उन्हे भी मौका दे।’’ श्री समुन्द कहते ‘‘मौका तो सभी को मिलता है वे भी प्रतियोगिता में भाग लेते है। अब तुम कहते हो की हम प्रतियोगिता में भाग न ले आरक्षण का लाभ न लेताकि वे खाली सीट अंत में उपयुक्त उम्मीदवार नही है कहकर तुम्हारे लिए आरक्षित हो जाये।’’
इस प्रकार दोनो में घंटो विवाद चलता रहता कभी आरक्षण को लेकर तो कभी जाति या वर्ग को लेकर। बातचीत भी क्यों न हो आखिर दोनो कालेज के समय के दोस्त जो थे। साथ में ही वे कम्पीटिशन पास करके नौकरी पर लगे। मि. समुन्द को आरक्षण से नौकरी तो जरूर लगी लेकिन वह मेघावी छात्रों में था। बल्कि पढ़ाई में वह अमित से बीस ही था दोनो ने ट्रेनिंग भी साथ में कीकई साल साथ में काम करने के कारण दोनों में गहरी मित्रता हो गईमित्रता भी ऐसी की जिसमें औपचारिकाताओं का नामों निशान नही। जितना कार्यालय में निजता उतना ही पारिवारीक अपनापन  भी। अक्सर एक दूसरे के घर आना जाना होता था। लेकिन केवल एक मुद्दे पर ही दोनो में बहस हो जाया करतीवर्ग जाति एवं आरक्षण। समुन्द हर बार अपनी बातों में नरमी बरतता था क्योंकि उसको अमित की मित्रता खो जाने का भय रहता था। उसे लगता कि उसके करीब आया एक मात्र सवर्ण मित्र कही हाथ से चला न जाय। यदि ऐसा हुआ तो वह अपने आप को दलित समझने लगेगा। शायद उसे भ्रम था कि मि. श्रीवास्तव के साथ घुल-मिल जाने के कारण वह भी सवर्णो की जमात मे शामिल हो गया। लेकिन जब भी कार्यालय या दोस्तों के बीच अमित की मौजूदगी में इस मुद्दे पर बहस होती तो उसे बड़ी शर्मिदगी उठानी पड़ती। उसे लगता आरक्षण लेकर उसने बहुत बड़ा अपराध किया है। और उसका खास दोस्त अमित इस मौके पर समुन्द को जलील करने का कोई मौका हाथ से न जाने देता। दोस्ती की सारी मर्यादा को ताक में रखकर आरक्षण के नाम पर समुन्द को नीचा दिखाने की कोशिश करता। यदि समुन्द अपने पक्ष में कुछ बोलता तथ्य देता तो नक्कार खाने की तूती की तरह उसकी आवाज दबा दी जाती। अगर किसी प्रकार प्रतिवाद में सहमति बनती तो इस पर आकर बात अटक जाती की एक ही आदमी को बार-बार आरक्षण नही लेनी चाहिए क्योंकि बाकी लोगो को आरक्षण का लाभ नही मिल पाता है। समुन्द इसके जवाब में तर्क देता कि आरक्षण लाभ मिलना तो दूरअभी तक बैकलाग तक नही भर पा रहे है।
लेकिन जाति के कलंक की बात उसके जुबां पर नही आ पाती थी। शायद उसके अंदर बैठा दलित मन ऐसा करने में सकुचाता था। कई बार मन में आई इन झंझावतों की चर्चा अपनी पत्नी से करता। वह उसे समझाती कहती जाने दिजिए न। समय आयेगा तो सब ठीक हो जायेगा। वे अगर दलित जाति में पैदा होते तो जानते दलित का दर्द।

आफिस के पास कालोनी में समुन्द का सरकारी आवास था। सामने की गली में थोड़ा आगे कि ओर बच्चों का गार्डन था जिसमें फूल पत्ते कम फिसल पट्टीयां ज्यादा थी। कुछ टूटी हुई तो कुछ टूट कर बूढ़ो एवं बड़ो के बैठने के काम आती थी। घर के पिछवाड़े एक ब्लाक ओर था। उसके पीछे फिर एक गली इस गली पर ही अमित श्रीवास्तव का मकान था। अमित का सारा परिवार पढ़ा लिखा था। पिता संभाग में ज्वाईट कमीशनर भाई पुलिस इन्सपैक्टर तथा बहन आर्मी में डाक्टर थी। वही दूसरी ओर आर.एल.समुंद का बड़ा भाई नगरपालिका में सफाई कर्मी पिता नगरपालिका में मुकरदम थे। जैसे तैसे पढ लिखकर समुन्द सरकारी नौकरी पा गया। लेकिन बड़ा भाई बारहवी पास था, इसके बावजूद नगर पालिका द्वारा उसे मैला उठाने कि नौकरी दी। कई बार रेल्वेबैंक आदि का फार्म भरा लेकिन कही भी सलेशन नही हो पाया। होता भी कैसे क्योंकि बारहवी पास करते ही उसे नगरपालिका में नौकरी करनी पड़ीघर जो चलाना था। पिता की श्वांस की बिमारी के कारण वे नौकरी नही कर पा रहे थे। और वह छुट्टी लेता तो घर कैसे चलताइसी कारण वह काम्पीटिशन की तैयारी नही कर पाया। आज इसी मैला ढोने की नौकरी को ही अपनी नियती मान चुका है। जब भी वह आर.एल.समुन्द के पास मिलने के लिए जाता आस पड़ोस के लोग नाक-भौं सिकोड़तेआपस में कानाफूसी करते। शायद बड़े भाई का रहन सहन कालोनी के अनुरूप नही था। लेकिन इसी बड़े भाई ने समुन्द को इस काबील बनाया कि वह सरकारी इज्जदार नौकरी पा सके। इसलिए समुन्द उनकी खूब इज्जत करता था।

कुछ अर्से बाद अमित श्रीवास्तव ने शहर में एक मकान ले लिया और वे वहां ‍शिफ्ट कर गये। चूकि समुन्द से उनकी करीबी थी इसलिए अमित ने सलाह दि की इसी कालोनी में थोड़ा आगे जमीन का टुकड़ा बिकाउ है वे चाहे तो वहां जमीन ले सकता है। जहां भविष्य में मकान बनाया जा सके। समुन्द को भी जमीन लेने की बड़ी इच्छा थी ताकि अपना खुद का मकान बनाया जा सके। उसका पूरा जीवन सरकारी मकान में ही कटा। पहले तो नगरपालिका के तंग बस्ती में, फिर नौकरी लगने के बाद इस मकान में। आर.एल.समुन्द ने जैसे-तैसे करके इस जमीन को खरीद ही लिया। अब समस्या वहां घर बनाने की थी। इसके लिए उसने गृहऋण प्रोविडेंडफंड आदि से व्यवस्था कर ली। इस प्रकार घर बनने का काम भी चालू हो गया अब हर रोज इस नये मकान की ओर उसे जाना पड़ता। रास्ते में अमित का घर भी पड़ता था। थोड़ी देर वह वहां रूकता गपशप होती फिर वह अपने मकान के निर्माण की प्रगति एवं देखरेख मे चला जाता। अब तक समुन्द के घर का नीव तक का कार्य पूर्ण हुआ था। शेष कार्य के लिए ट्रक से ईट रेत सीमेंन्ट आदी लाया जा रहा था।
अबजब भी अमित के घर आना होता तो भाभी (अमित की पत्नी) तुरंत चाय लाकर देती और समुन्द अमित के बीच फिर किसी न किसी मुद्दे पर बहस छिड़ जाती। एक बार अमित श्रीवास्तव ने कहा - ‘‘देख यार अब बता तेरे मेरे में क्या अंतर तू भी अपना खुद का घरवाला हो गया। लेकिन तेरे बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलेगा मेरे बच्चों को नही। बता सही में प्रताड़ित कौन है।’’
समुन्द ने कहा -‘‘ठीक कहता है यार मै तेरी बात मानता हूं अब तेरे मेरे में कोई अंतर नही है। जब कोई अंतर नही है तो तू क्या अपनी बेटी की शादी मेरी बेटे से करेगा?’’
अमित को ऐसे लगा जैसे उसके कानों में कोई चैड़े पंजे का झापड़ रसीद कर दिया हो। चारों और अंधेरा छा गया। आवाक सा रह गया था वो। आचानक कोई भी जवाब नही दे पाया। बच्चों तक यह बात पहुंच गई जो पहले से ही पारिवारीक मित्र तो थे ही।  अमित श्रीवास्तव की पुत्री जिसे अभी-अभी कालेज में दखिला मिला था। वह यह समझ नही पा रही थी कि पिता मौन क्यों रहने लगे ऐसी क्या बात हो गई अंकल के साथ। उसे सारा मसला पहेली की तरह लग रहा था। पापा की चुप्पी उसे और रहस्यमय बनाती थी।
छुट्टी के दिन अमित अपने परिवार के साथ अवकाश का लाभ ले रहे थे तभी उसकी पुत्री ने उस पहेली का हल पुछना मुनासीब समझा वे अपने पिता से पूछ बैठी- ‘‘बताओं न पिताजी आखिर समुन्द अंकल और हम में क्या अंतर है। आप हमेशा समुन्द अंकल से कहते आये हो कि हमारे और तुम्हारे में कोई अंतर नही, लेकिन उस दिन से आप चुप क्यो हो गयेआखिर अंतर है कहां?’’ 
अमित अपनी पुत्री से मित्रवत व्यवहार करते थे। विषय साम्प्रदायिक होने के बावजूद अपनी पुत्री के सम्मुख मौन रहना उसे अपनी हार की तरह प्रतीत हो रहा था। यह प्रश्न उसके पिता होने के वजूद को भी ललकार रहा था। उसने सहज होते हुए कहा- ‘‘बेटा उस दिन तो मै चुप हो गया था लेकिन तभी से मै आज तक उनमें और हमारे में अंतर का मर्म जानना चाह रहा हूं लेकिन अभी तक मै सभी संभावित सभी उत्तर से सहमत नही हूं’’
इतने में कालबेल की घंटी बजी अमित की पुत्री ने दरवाजा खोला। पीछे-पीछे अमित भी बाहर आ गये।
‘‘कोई ट्रक ड्रायवर है इंटे लेकर आया है किसी का पता पूछ रहा है।’’ अमित की पुत्री सुमिता ने अपने पिता को बताया।
ड्रायवरट्रक से उतरा उसके हाथों में पर्ची थी वह अमित को दिखाते हुए पता पूछ रहा था। उस पर्ची में गंतव्य का पता लिखा था।
रामलाल समुन्द
(मेहत्तर का घर है)
अरविन्द नगर
अब अमित श्रीवास्तव को सारे प्रश्नों का जवाब मिल चुका था।

(यह कहानी दलित साहित्य कहानी कोश एवं मलमूत्र ढोता भारत में प्रकाशित है)