Saturday, 10 January 2026

Sudarshan Rishi and the Dumar (Domar samaj) community

सुदर्शन ऋषि और डुमार (डोमार) समाज

संजीव खुदशाह 

जो व्यक्ति अपना इतिहास नहीं जानता 

वह कभी नया इतिहास नहीं बना सकता।

              ·      डॉ भीमराव अंबेडकर

जब वाल्मीकि समाज के तर्ज पर कुछ लोगों ने सुदर्शन समाज का गठन सुदर्शन ऋषि के आधार पर किए जाने का बीड़ा उठाया तो उनके मन में सकारात्मक विचार ही थे। वे सोच रहे थे की इस बहाने डोमार समाज के लोग गंदे नाम (मेहतर, भंगी, स्वीपर) से छुटकारा ले लेंगे। धर्म कर्म के काम में लग जाएंगे। एक नई पहचान होगी। लोग संगठित होंगे और जिस प्रकार वाल्मीकि नाम से जाति प्रमाण पत्र बनता है। वैसे ही समाज में सुदर्शन नाम से जाति प्रमाण पत्र बनने लगेगा। गौरतलब है कि वे गंदे जाति नाम या पहचान स्वीपर, भंगी, मेहतर शब्द से निजात पाना चाहते थे। उन्होंने सुदर्शन समाज के बैनर तले 27 जातियों को जो उनके समकक्ष थी। जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि इस संगठन में न ही इन जातियों का प्रतिनिधित्व था। न ही जमीनी तौर पर 27 जाति के लोग सुदर्शन से जुड़ना चाहते थे। इसीलिए सुदर्शन समाज और सुदर्शन ऋषि का प्रचार केवल डुमार या जिसे डोमार भी कहते हैं। उनके बीच ही रहा और प्रतिनिधित्व भी डोमार जाति को ही दिया गया। 

पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है। क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी सही नहीं मिल पाती है। इसका कारण यह है कि डोमार जाति के लोग अपनी जाति कहीं कुछ कहीं कुछ लिखवाते हैं। जैसे भंगी मेहतर कहीं जमादार भी लिख देते हैं। इसलिए सही-सही इनकी संख्या की जानकारी नहीं मिल पाती है। फिर भी एक अनुमान है कि पूरे देश में डोमार-डुमार जातियों की संख्या 5 से 7 लाख होगी। दलित जातियों के लिहाज से यह संख्या छोटी नहीं है। इसके हजारों संगठन है। नागपुर कानपुर जबलपुर में इस जाति के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। थोड़ी बहुत संख्या छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी है। 

मूल रूप से यह जाति बुंदेलखंड और बघेलखंड में निवास करती है या इनका यही मूल स्थान है यह भी कह सकते हैं। आज से करीब 200 साल पहले जब उत्तर भारत में अकाल पड़ा तो अंग्रेजों के काल में यह जातियां खाने कमाने के लिए बड़ी संख्या में शहर की तरफ आई। उन जगहों में आकर बस गई जहां पर रेलवे लाइन का काम चल रहा था। नए नगर बन रहे थे। इन जगहों में इन्हें जो काम मिला वह उन्होंने किया। कहीं वह सफाई कर्मी बन गए, कहीं मैला उठाने लगे, तो कहीं पर अच्छे कामों में भी लगे। सूअर पालन और बैंड बजाने का इनका पुश्तैनी काम था। अपनी मूल स्थान पर वे कभी इन गंदे कामों में नहीं जुड़े थे। इनका मूल व्यवसाय खेती किसानी, बांस के समान बनाना, जचकी के लिए दाई का काम, बैंड बजाने का काम, मुखाग्नि देने का काम करते थे। क्योंकि अछूत थे इसीलिए वे वहां भी प्रताड़ित थे। आज भी प्रताड़ित है। 

जैसे ही आजादी मिली इनके कर्ताधर्ताओं को यानी कि समाज के मुखियाओं को यह समझ में आने लगा की यह गंदा पेशा, उनका अपना काम नहीं है। और इससे मुक्त होना होगा। यह जातियां वाल्मीकि बस्ती के आसपास ही बसाई गई और इनका एक जैसा ही कलचर बन गया। वाल्मीकि समाज वाल्मीकि ऋषि के नाम पर पहले से ही संगठित था और संगठित हो रहा था। इन लोगों ने उनसे प्रेरणा लेकर सुदर्शन समाज के नाम से संगठन बनाने का प्रयास किया। जैसा कि मैंने पहले बताया है की सुदर्शन समाज गठन का मुख्य कारण था। अपनी नई और अच्छी पहचान बनाना। सफाई पेशे से जुड़ी ऐसी जातियां जो की वाल्मीकि नहीं है उन्होंने सुदर्शन ऋषि से जोड़ने का प्रयास किया। 

ऐसा नहीं है की डोमार समाज के लोग केवल सुदर्शन से ही जुड़े रहे ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं आजादी के पहले भी आजादी के बाद भी की किस प्रकार इन्होंने अपना पंचायत डोमार समाज के नाम से बनाया और उत्थान के लिए बहुत सारे कार्य किया। 

जबलपुर के कवि कालूराम मंजर ने 1961 को एक किताब का प्रकाशन किया जिसका नाम था "कुरीति प्रक्षालन आदि डोम डुमार समाज" इस किताब में उन्होंने जाति सुधार, जाति का नामकरण, शब्द पर विश्लेषण, हम चांडाल नहीं हैं, वंशावली, देवक डोम आदि के बारे में विस्तार में जानकारी प्रकाशित किया है। 

इसी प्रकार जबलपुर से ही "सामाजिक मार्गदर्शिका" नाम से 29 मार्च 1993 को एक पत्रिका का प्रकाशन किया गया. इसके संपादक मंडल एस के वर्मा, एच बी तांबे, एच एस पाठक, आर के देवक, बी पी चमकेल थे। इस पत्रिका में उन्होंने 1885 के पहले के पूर्वज चौधरी, मुखिया, साखीदार आदि की जानकारी को संग्रहित किया है। 1901 से लेकर 1993 तक के संगठनों का विस्तार से विवरण दिया है। कई अखाड़ा, भजन मंडली, मित्र मंडली के नाम से बने संगठनों का विवरण मिलता है। इसी पत्रिका में यह भी जानकारी मिलती है कि 1972 में "मध्य प्रदेश डोम डुमार संघ" का पहली बार रजिस्ट्रेशन किया गया। जिसके अध्यक्ष पूर्व विधायक मंगल पराग थे। महामंत्री श्री नारायण कोषाध्यक्ष यूलीचंद मलिक , संगठन मंत्री मैनाराम बड़गैया थे। इसी दौरान डोमार समाज अंबेडकर से भी जुड़ रहा था। 1973 में "डॉक्टर अंबेडकर साहित्य प्रचार मंडल का गठन किया" इसके संस्थापक थे इंद्रपाल गौतम, शिवनाथ चौधरी, श्रवण कुमार वर्मा, दुर्गा प्रसाद चुहटेल। यहां पर 1982 में "सुदर्शन समाज एवं डोम डुमार प्रबंधक समिति" का गठन हुआ इसके संस्थापक थे हरिप्रसाद भारतीय, मैनाराम बड़गैया, जालिम सिंह , प्रेमलाल ठाकुर, हरिशंकर पाठक, तुलाराम कर्सा, चंदन लाल पसेरीया, बाबूलाल मलिक, प्रसादी लाल बिरहा आदि। 1990 में "डोम डुमार एकता समिति बिलहरी" का गठन हुआ। 1990 में ही "बाबा अंबेडकर जनहित कल्याण समिति" का गठन हुआ। 1991 में "मध्य प्रदेश युवा डोमार महासंघ" का गठन किया गया। जिसके अध्यक्ष थे रविंद्र चंदेल, महामंत्री दिलीप कुंडे, कोषाध्यक्ष राम प्रसाद ग्रावकर इत्यादि। इसी पत्रिका में जन्म से संबंधित छठी, मूल, बरहो, जन्मदिन के जो रीति रिवाज हैं। उनका जिक्र किया गया है। सगाई, फलदान, लगन, सिंगार का सामान, चिकट, बारात का टीका, द्वारचार, बारात का भोज, समधौरा, पैर पूजन, भंवर, विदाई आदि का जिक्र किया गया है। मृत्यु के रस्मो रिवाज का भी जिक्र है। इसी प्रकार अच्छी बात यह है की विधवा और विदुर विभाग का भी इसमें विवरण दिया गया है। जबलपुर में ही मध्य प्रदेश डोम डुमार समाज महासंघ का गठन रामेश्वर गौतेल के द्वारा किया गया लेकिन इनकी क्रिया कलाप की जानकारी नहीं मिलती है। 

ठीक इसी प्रकार बिलासपुर में बापू नगर में जो संगठन बने हुए डुमार समाज के नाम पर बनाए गए। इनका बाकायदा निर्वाचन होता है और समाज के लिए अच्छा कुछ करने का प्रयास किया जाता है। आज से 20 साल पहले यह संगठन जाति पंचायत की तरह काम करता था। लेकिन अब यह संगठन शिक्षा रोजगार स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी काम कर रहा है। बिलासपुर में ही कर्बला और दूसरे मोहल्ले में रहने वाले लोग सुदर्शन के नाम पर संगठन बनाकर काम करते थे। और अभी भी कर रहे हैं। डॉ अंबेडकर को लेकर भी कई संगठन बनाए गए हैं उस पर भी काम किया जा रहा है। रायपुर की राजधानी छत्तीसगढ़ में 2010 में दलित मूवमेंट‌ एसोशिएशन नाम की संस्था का पंजीयन कराया गया और अंबेडकर जयंती के दिन बड़े सामाजिक कार्यक्रम कराए जाते थे। इस संगठन ने एक पत्रिका का प्रकाशन किया जिसका नाम दलित उत्थान पत्रिका था। करीब 3 साल से छत्तीसगढ़ डोमार समाज का गठन किया गया है जिसके सदस्य और पदाधिकारी हर जिले में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसी प्रकार खड़कपुर नागपुर में भी लोग कहीं पर सुदर्शन के नाम पर तो कहीं पर मेहतर भंगी के नाम पर संगठन बनाकर काम करते हैं।  लेकिन डूमार समाज में जो बड़े सम्मेलन हुए और जो बड़े कार्यक्रम किए गए। वह कार्यक्रम अखिल भारतीय सुदर्शन समाज के बैनर तले किए गए। 

अखिल भारतीय सुदर्शन समाज के सबसे पहले अध्यक्ष राम सिंह खरे इलाहाबाद और सचिव मकरंद लाल भारतीय कानपुर से थे। इन्हें सुदर्शन समाज का फाउंडर भी माना जाता है। चूंकि यह दोनों डोमार समाज के थे। इसलिए डोमार समाज के लोग बड़ी संख्या में इस संगठन से जुड़े और काम किया। खड़कपुर में इसी संस्था के बैनर तले एक स्कूल का भी संचालन किया गया। जिसमें गोपाल दास बाघमार शिक्षक थे। आगे चलकर वे इसी संस्था के अध्यक्ष बन गए। गोपाल दास बाघमार 1999 में एक पत्रिका का प्रकाशन किया "प्रतिवेदन" जिसमें समाज से संबंधित जानकारी को प्राथमिकता दी गई। इसी पत्रिका के अंक दो में मकरंद लाल भारतीय का एक लेख "हमारे पूर्वज महर्षि सुदर्शन जी" प्रकाशित हुआ था। जिसमें पहली बार यह दावा किया गया की डोम, डुमार, बसोर, मांग, महार, बल्हार, धानुक, हेला, चूड़ा, लालबेगी, रावत, धरकार, मेहतर, सुदर्शन, मेस्तर, नगाड़ची, बाल्मीकि, तुरहिया, भंगी, बातदार, हाड़ी, दुसाध, वंशफोड़ आदि लोग सुदर्शन ऋषि को मानते हैं। इस पत्रिका के अंक दो में गोपाल दास बाघमार और दुर्गा प्रसाद धानुक लखनऊ का भी एक लेख प्रकाशित है। जिसमें वह सफाई कामगारों के उत्थान के और उनकी समस्याओं पर बात करते हैं। इसी समय जबलपुर से "दलित डोम दर्पण" नाम से एक साप्ताहिक का प्रकाशन 2000 में किया गया। जिसका प्रथम अंक इन पंक्तियों के लेखक के पास है। इसके संपादक घनश्याम दास चमन लाल चमकेल हैं। इस अंक में दीनदयाल बड़गैया को रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से डोम डूमार समाज के ऊपर पीएचडी की उपाधि मिलने का भी समाचार प्रकाशित हुआ है। इसी प्रकार भोपाल से एक पत्रिका प्रकाशित होती थी "सुदर्शन संदेश" इसके प्रधान संपादक थे बालचंद हवेलियां। वे सुदर्शन ऋषि और सुदर्शन समाज के पैरोकार थे और काफी सक्रिय थे। 

 

सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक देव कुमार कानपुर बताते हैं कि शुरू में जब सुदर्शन समाज की बैठके हुई तो उसके फाउंडर लक्ष्मण भगत थे उन्होंने ही कानपुर में इसका प्रचार किया। जो की मकरन्द लाल भारतीय के ससुर भी थे। बातचीत के दौरान देव कुमार कहते हैं कि कानपुर में डुमारो की संख्या करीब डेढ़ लाख है और ज्यादातर लोग बस्तियों में रहते हैं। इनका प्रमाण पत्र वाल्मीकि जाति के नाम से या फिर बसोर के नाम से बनता है। आज भी कानपुर में डेढ़ लाख की संख्या होने के बावजूद डुमार या डोमार नाम से कोई संस्था नहीं है। न ही जाति पंचायत है। जाति पंचायत है भी तो स्वच्छकार नाम से है।

महाराष्ट्र पुलिस विभाग में पुलिस अधीक्षक रह चुके के एम बेरिया जी बताते हैं कि नागपुर में लोग सुदर्शन समाज से जुड़े हुए हैं। जिसमें हेला, मखियार, डुमार भी है। इन जातियों का अपना कोई संगठन जाति नाम से नहीं है। सुदर्शन सामाज नाम से ही पहचाने जाते हैं। लेकिन इन सभी जातियों का जाति प्रमाण पत्र भंगी या मेहतर के नाम से बनता है।

गौरतलब है कि अखिल भारतीय सुदर्शन समाज पुरानी संस्था तो पहले से थी बाद में इसके दो टुकड़े हो गए। कुछ लोगों ने नागपुर में भारतीय सुदर्शन समाज का गठन किया था। इन दोनों संगठनों को फिर मिलाकर एक नया संगठन बनाया गया "भारतीय सुदर्शन समाज महासंघ" जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नागपुर के दिलीप हाथीबेड है। वे पहले सुदर्शन वाल्मीकि मखियार नाम से संगठन चलाते थे।

जैसा की विदित है मेहतर, भंगी, स्वीपर नाम से कोई भी जाति एक्जिस्ट नहीं करती है। इनका अपना जाति नाम कुछ और है। जो जातियां सफाई काम से जुड़ी रही, उन्हें इन गंदे नाम से पुकारा जाने लगा और इन्हीं नाम से उनका कास्ट सर्टिफिकेट भी बनने लगा। उनकी वास्तविक जाति की पहचान, उनकी गरिमा, उनका सम्मान सब ध्वस्त हो गया। सुदर्शन समाज का गठन जिस मकसद के लिए किया गया था वह कहीं और खो गया। आजादी के इतने सालों बाद भी सुदर्शन के नाम से जाति प्रमाण पत्र बनने की कोई प्रक्रिया या समाधान नहीं है। मूल जाति नाम से लोग इतने दूर हो गए हैं कि केवल शादी ब्याह में इसकी पूछ परख होती है। बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जिनका डोम या डुमार या डोमार या हेला नाम से जाति प्रमाण पत्र बनता है। 

वैसे हेला जाति केन्द्रीय अनुसूची, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल है। महाराष्ट्र की किसी सूची में हेला नाम दर्ज नहीं है। उत्तर प्रदेश में हेला अनुसूचित जाति वर्ग से ही आते हैं। लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जिनका जाति प्रमाण पत्र मेहतर, भंगी नाम से बन रहा है वह अनुसूचित जाति का लाभ ले रहे हैं। इसी प्रकार मखियार जाति का नाम जाति की सूची में है ही नहीं न केंद्र में है न राज्य की सूची में है। लेकिन यह जाति, जाति के रूप में मौजूद है। इनका भी जाति प्रमाण पत्र मेहतर या भंगी या वाल्मीकि के नाम से बनता है। डोमार, डुमार जाति का नाम उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति लिस्ट मे मौजूद है।

बहरहाल हमें यह मूल्यांकन करना पड़ेगा की क्या हमने इस बीच खोया है और क्या पाया है? सुदर्शन समाज से 27 जाति जोड़ने का दावा जमीनी स्तर पर खरा नहीं उतरता है।  क्योंकि उत्तर प्रदेश में हेला जाति के संगठन तो बहुत मिलते हैं। बहुत सारी जातियां भी ऐसी है जो की सुदर्शन से जुड़ना नहीं चाहती और विरोध करती है। इन्हें सिर्फ डुमारो का संगठन कहती है। छत्तीसगढ़ में तो सुदर्शन के साथ नहीं जुड़ने के मकसद से बात थाने तक पहुंच गई थी। यानी डोमार जाति ही सुदर्शन से जुड़ी हुई है (और अन्य जाति के वे लोग जिन्होंने वैवाहिक संबंध किए है)। इस प्रकार वे अपने वास्तविक जाति नाम गौरवशाली इतिहास को भूला चुकी है। न ही इस जाति नाम से जाति प्रमाण पत्र बनाने का मांग किया जाता है। जबकि यह जाति गजट की अनुसूची में भी उपलब्ध है। यानी सुदर्शन के नाम से सबसे ज्यादा नुकसान डोमारो को हुआ है। जिन जातियों को इस नाम से नुकसान होने का  अंदेशा लगा वह पहले ही दूर हो गई है ‌। जिसकी भरपाई मुश्किल लगती है। जो इस नाम पर संगठन बने हुए हैं और पदाधिकारी हैं वह पीछे लौटना नहीं चाहते। सच्चाई जानकर भी। क्योंकि इससे उनका व्यक्तिगत नुकसान भी है। पहचान का भी प्रश्न है। इस समाज के जो लोग नेतागिरी कर रहे हैं उनका अंतिम लक्ष्य सफाई कामगार आयोग में एंट्री करना है। इससे ऊपर वह उठना नहीं चाहते हैं। इन सब कारणों से यह समाज अंबेडकरवादी आंदोलन से भी काफी दूर है। इसलिए शिक्षा और नौकरियों में भागीदारी कम है। इस समाज में राम रतन जानोरकर जैसा मार्गदर्शक होने के बावजूद ये क्यों पिछड़ता जा रहा है यह अलग प्रश्न है। इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए।

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Friday, 2 January 2026

Former Mayor of Nagpur, Dalit activist Babu Ramratan Janorkar, son of a sanitation worker.

 

सफाई मजदूर के बेटे पूर्व महापौर नागपुर दलित मित्र बाबू रामरतन जानोरकर

संजीव खुदशाह

बाबू रामरतन जानोरकर एक ऐसे शख्स का नाम है जिन्होंने नागपुर की धरती में सफाई मजदूर के घर जन्म लिया डॉं भीमराव अंबेडकर के साथ काम किया। वे 14 अक्टूबर 1956 के डॉ भीमराव अंबेडकर की धम दीक्षा संयोजक समिति के उपसचिव रहे है। 1957 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा 1957 भारतीय बौद्ध महासभा के अखिल भारतीय अधिवेशन की वे जनरल सेक्रेटरी रहे।

राम रतन जानोरकरजी को प्यार से बाबूजी भी कहते थे। बाबूजी का जन्म 8 अगस्त 1931 में पांच पावली की सफाई मजदूर बस्ती में हुआ था। इनके पिताजी जालिम जियालाल नगर पालिका में सफाई जमादार थे और माता गंगाबाई भी नगरपालिका में सफाई मजदूर का काम करती थी। वह कहते हैं कि उनका परिवार उत्तर प्रदेश के बांदा जिला से हिंदु जाति व्यवस्था और उनकी प्रताड़ना से तंग आकर नागपुर आ गये। वे डोमार अनुसूचित जाति वर्ग से आते थे।

प्रसिद्ध लेखक एडवोकेट भगवान दास कहते हैं कि जानोरकर साहब का जन्म डोमार जाति में हुआ था। जो बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों में आबाद है। डोमार जाति अन्य अछूत जातियों से भिन्न है। बांदा जिले के गांव राजापुर तथा आसपास के इलाके में यदि कोई अछूत जाति सम्मान के लिए टक्कर देती है तो वह केवल डोमार लोग ही हैं। कई बार लड़ाई में उनके हाथों कत्ल भी हो जाता है। जानोरकर के दादा स्वर्गीय जियालाल दीवान इसी गांव में रहते थे। आज भी जानोरकर के परिवार के सदस्य इसी गांव में निवास करते हैं। 19वीं शताब्दी में ऐसी हालत में जातिगत लड़ाई के बाद डोमार जाति के लोग राजाओं रियासतों जातिवाद के अत्याचारों से तंग आकर या कहें भाग कर नजदीक के अंग्रेजी शासन के इलाके में शरण लेते रहे। गांव में उनका वहां कोई खास पेशा नहीं था। अन्य छोटी जातियों की तरह वे खेत मजदूर थे या वे सभी काम कर लेते थे जिन्हें गंदा और नीच समझा जाता था। बड़े शहर में जीविका के लिए जो भी बिना शिक्षा दीक्षा का काम मिला उन्होंने कर लिया। कुछ लोग नई बनी म्यूनिसिपल कमेटियों में सफाई का काम करने लगे और वहीं फस गए। आबादी बढ़ती चली गई और वह यही के होकर रह गए।

राम रतन जी जब 5 वर्ष के हुए तो उनके पिताजी का साया उठ गया और 10 वर्ष की आयु में माताजी ने साथ छोड़ दिया। परिवार आर्थिक संकट में फस गया। बाल्यावस्था में ही रामरतन जी को सफाई मजदूर की नौकरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। बड़ी बहनो समेत लंबा चौड़ा संयुक्‍त परिवार था। इस बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई को भी जारी रखा। दलितों के मसीहा डॉ आंबेडकर से प्रेरणा लेकर राम रतन छात्र जीवन में ही दलित उद्धारक राजनीति से जुड़ गए थे। नागपुर में जब शेड्यूल कास्ट स्टूडेंट फेडरेशन बना तो वह उसके सचिव बन गए। छात्रों के बीच सक्रिय हिस्सेदारी के कारण बड़ी आसानी से उन्हें सक्रिय राजनीति में बिना किसी की उंगली पकड़े प्रवेश मिल गया। नागपुर महानगर पालिका की सेवा में स्वयं होकर मुक्ति‍ पाई और दलितों की सेवा के काम में जुट गए। नागपुर शहर में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के सचिव बन गए। इस पद के कारण भी सार्वजनिक तौर पर दलितों के बीच एक चमकते सितारे की तरह उभरे।

जानोरकर जी को पुस्तक, पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने का शौक था। शासन को अंदर से देखा राजनीति को बाहर से सोचने समझने और कुछ करने की आदत थी। जो बहुत कम लोगों में होती है। जिंदगी के कुछ उसूल बनाए और उन पर दृढ़ता से अमल किया। न झुके, न बिके, न डरे, न बहके अपने रास्ते पर चलते रहे हैं। बाबू हरिदास आवडे एक लंबे अरसे तक इस इलाके में काम करते रहे हैं। उनकी तरह ईमानदार निष्ठावान सूझबूझ वाले बहुत कम लोग पैदा होते हैं। जानोरकर जी उनके संपर्क में आये और उनकी मृत्यु तक वफादारी के साथ काम करते रहें।

जानोरकर जी ने 1949 में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन में दिलचस्पी ली। परंतु नौकरी छोड़ने के बाद फेडरेशन तथा रिपब्लिकन पार्टी में पूरी लगन और दिलचस्पी से काम किया। कई महत्‍वपूर्ण पदों पर नियुक्त हुऐ, आंदोलन में भाग लिया, कई बार जेल भी गए, रिपब्लिकन पार्टी के झंडे तले इलेक्शन भी लड़े। 1951 के बाद वह बौद्ध धर्म में दिलचस्पी लेने लगे। 1956 में अन्य लोगों के साथ बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर द्वारा महान दीक्षा सम्मेलन में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। दिक्षा समिति के उपसचिव रहे। 1975 में वे भारतीय बौद्ध महासभा में शामिल हुए। वे 1976 में नागपुर महानगर पालिका में मेयर चुने गए।

नागपुर में सफाई कर्मचारियों को कर्ज और जमाखोरों से मुक्त करने के लिए उन्होंने एक कोऑपरेटिव सोसाइटी कायम करने का सोचा और लोगों को यह समिति बनाने पर राजी किया। मेहतर को ऑपरेटिव सोसाइटी के नाम से स्थापित समूचे भारत में मेहतरों की या सबसे बड़ी कोऑपरेटिव सोसाइटी नागपूर (मेहतर बैंक) है जो करोड़ों अरबो रुपए का लेनदेन करती है।

जानोरकर जी राजनीतिज्ञ होने के अलावा समाज सुधारक भी थे। वह जात-पात विरोधी थे और केवल जात-पात के खिलाफ भाषण नहीं देते थे। बल्कि उसे अमल भी करते थे। अपने बच्चों के विवाह अपनी जन्म जाति से बाहर किया। खुद भी अंतरजातीय विवाह किया। उनके रिश्तेदारों में मेहतर, वाल्मीकि, इसाई आदि कई जाति के लोग हैं। नागपुर में विवाह और मृत्यु में अन्य अछूत जातियों में बहुत फिजूल खर्ची होती थी। परंतु अपनी लड़कियों के विवाह उन्होंने ठीक बाबा साहब डॉं अंबेडकर की दिखाएं रास्ते के मुताबिक किया। जानोरकर जी शराब सिगरेट बीड़ी आदि का सेवन नहीं करते थे और यह प्रचार भी करते थे कि नशा नहीं करना चाहिए। वह बहुत स्पष्टवादी थे उनकी यह आदत कभी-कभी कुछ लोगों को नाराज कर देती थी। परंतु उनके सोचने का ढंग बहुत ही तार्किक था।

जानोरकर जी सफाई कामगार जातियों में शिक्षा के प्रसार को महत्व देते थे। इसके लिए उन्होंने मध्य प्रदेश समेत अन्य प्र‍देशों में प्रचार भी किया। पंपलेट और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने इस काम को आगे बढ़ाया। लेकिन संसाधनों की कमी के कारण यह लंबे समय तक नहीं चल सका। उन्‍होने पूरे देश में घूमकर बौध्‍द धर्म का प्रचार किया और लोगो को बौध्‍द धर्म की दीक्षा दी।

बाबू राम रतन जानोरकर जी बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे। वे रिपब्लिकन पार्टी और अंबेडकर आंदोलन की बढ़ोतरी के लिए संघर्षशील न रहते तो उनसे यह क्षमता थी कि वह समूचे भारत में एक जातियां वर्ग के नेता बन सकते थे। परंतु उन्होंने अंबेडकर आंदोलन को बढ़ाने और संगठन को महत्व दिया और पार्टी के प्रति वफादार रहे। यदि अन्य नेताओं की तरह वे बिक जाते तो ऊंचा पद और धन दोनों उनके पास होता। परंतु वह असूल से बंधे रहे एक छोटी सी झोपड़ी नुमा घर में रहकर भी बाबा साहब की मिशन को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहे। वह सही मायने में दलित मित्र हैं उस बीज की तरह जो मिट्टी में मिलकर अपना वजूद खोकर नए वृक्ष को जन्म देता है। उनके बारे में कहा जाता है कि वह गरीब स्थिति होने के बावजूद रोज सुबह ब्रेड डबल रोटी गरीबों में बांटा करते थे और यह काम उन्होंने अपने जीवन पर्यंत किया। इन पंक्तियों के लेखक ने उन्‍हे ऐसा करते देखा है।

पहले नागपुर में सफाई कामगारों की नौकरियां जाति आधारित निकाली जाती थी। जिसमें सिर्फ सफाई कामगार जातियां ही आवेदन कर सकती थी। रामरतन जानोरकर ने इसका विरोध किया। उन्‍होने सभी जाति के लिए यह मार्ग खुलवाया। उन्होंने कहा कि जिस दिन सफाई कामगार जातियां दूसरे कामों में लग जायेगीं तथा सफाई काम में अन्‍य जातियां आएंगी तभी यह देश प्रगति हुआ है माना जाएगा।

भले ही वे वाल्‍मीकि एवं सुदर्शन जयंती में जाते थे। किन्‍तु वे यह मानते थे की सफाई कामगारों का भला पौराणिक ऋषियों की पूजा अर्चना करने से नहीं होगा क्योंकि इससे सफाई कामगार समाज धार्मिक जाति व्यवस्था के सामने नतमस्तक होकर शिक्षा से दूर हो जाता है। जिसके कारण वह विरोध नहीं कर पाता। वह मानते थे कि अंबेडकर वादी आंदोलन और विचारधारा के प्रभाव में आने के बाद ही समाज का भला हो सकेगा। उन्‍हे महाराष्ट्र सरकार द्वारा बाबा साहेब अंबेडकर दलित मित्र सम्‍मान दिया गया। वे पूरी जिंदगी सक्रिय रहे 19 जून 2005 को 74 वर्ष की आयु में उनका परी निर्वाण हुआ। काश पूरा समाज उनसे प्रेरणा लेता और उनके बताऐ रास्‍ते पर चलता।

 

Thursday, 1 January 2026

Know who is the Jogendra Nath Mandal

जानिए कौन है जोगेंद्र नाथ मंडल

संजीव खुदशाह

पाकिस्तान संविधान सभा के पूर्व अध्यक्ष एवं पाकिस्तान के ही प्रथम कानून मंत्री के रूप में सेवाएं दे चुके जोगेंद्र नाथ मंडल को आज लगभग भुला दिया गया है। वह नमो शूद्र (दलित) समाज के लोकप्रिय नेता थे और उन्होंने बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर अछूतोंद्धार के लिए बहुत काम किया था। आइए आज हम जानने की कोशिश करेंगे की वह कौन थे और क्यों उन्होंने पाकिस्तान छोड़कर फिर से भारत में शरण ली।

जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म वर्तमान बांग्लादेश जिला बिरिसाल में 29 जनवरी 1904 को हुआ था। उनके पिता चाहते थे कि घर में कुछ हो या न हो लेकिन उनका बेटा शिक्षा जरूर हासिल करें। मंडल की शिक्षा का खर्च उनके बेऔलाद चाचा ने उठाया। एक स्थानीय स्कूल में पढ़ने के बाद उन्होंने बंगाल की बिरिसाल के सबसे अच्छे शिक्षा संस्थान बृजमोहन कॉलेज में दाखिला लिया। बिरिसाल पूर्वी बंगाल का एक शहर था। जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।  

अपनी स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बिरिसाल की नगर पालिका से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की। उन्होंने निचले तबके के लोगों के हालात सुधारने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया।

जोगेंद्रनाथ मंडल नामोशुद्र समुदाय से आते थे। नामोशुद्र हिंदू जाति व्यवस्था के बाहर की जाति के रूप में मान्यता थी सरल शब्दों में इन्‍हे अछूत भी कह सकते है। बंगाल के भद्रलोक द्वारा इनका शोषण किया जाता था। बेगार प्रथा, घृणित काम के लिए दबाव दिया जाता था। लेकिन अपनी बेहतर स्थिति के लिए इन्होंने एक आंदोलन शुरू किया था। नमो शूद्रों को पहले चांडाल कहा जाता था। चांडाल जाति बंगाल की बहुसंख्यक अछूत जाति में गीनी जाती है। आंदोलन में इन्होंने गंदे काम और बेगारी करने से मना कर दिया। अपने आपको चंडाल के बजाए नमो शूद्र कहना प्रारंभ किया।

चांडाल जाति की लोगों ने 1901 में बंगाल की अंग्रेज सरकार से अभ्यावेदन देकर अनुरोध किया कि उन्हें जाति पदानुक्रम में बेहतर स्थान दिया जाए। चांडाल के बजाय उन्हें नमो शूद्र के नाम से पुकारा जाए। उनकी मांग को स्वीकार कर लिया गया। तब से चांडालों को नमो शूद्र के नाम से मान्‍यता मिलने लगी।

जोगेन्‍द्र नाथ मंडल ने 1937 के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र से बंगाल विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार को हरा दिया। बाद में मंडल ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिया। कांग्रेस पार्टी में उच्च जाति (भद्र लोक) के द्वारा उनके साथ भेदभाव होने लगा। उन्होंने यह सोचा कि जब उनके हितों की रक्षा नहीं हो सकती। तो फिर उनके लोगों की हितों की रक्षा कैसे होगी? यह सोचकर उन्होंने मुस्लिम लीग ज्वाइन कर लिया। उन्‍हे मोहम्मद अली जिन्‍ना का करीबी माना जाता था। मंडल ने बंगाल में अखिल भारतीय शिड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन के साथ काम किया जिसके राष्ट्रीय नेता बाबा साहेब आंबेडकर थे.

डॉ अंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।

वे डॉक्टर अंबेडकर से काफी प्रभावित थे । संविधान सभा के लिए जब मुंबई से डॉक्टर अंबेडकर को जीत नहीं मिली तो उन्होंने बंगाल की अपनी सीट खुलना से डॉक्टर अंबेडकर को उपचुनाव लड़ने के लिए दिया और उनके लिए प्रचार भी किया। नमो शुद्र और मुसलमानों ने डॉक्टर अंबेडकर को वोट देकर संविधान सभा तक पहुंचाया।इसके बाद जुलाई, 1946 में आंबेडकर बंगाल से संविधान सभा के सदस्य बने. विभाजन के बाद आंबेडकर का निर्वाचन क्षेत्र खुलना पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में चला गया।

वह भारत के बंटवारे के पक्ष में नहीं थे लेकिन उन्होंने महसूस किया कि उच्च जाति के हिंदूओं के बीच रहने से नमों शूद्रो की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। इसीलिए उन्होंने सोचा पाकिस्तान दलितों के लिए ज्यादा बेहतर हो सकता है, । मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को यह यकीन दिलाया कि वे उनके साथ जाएं और वहां पर उनका सम्मान होगा तथा दलितों के साथ भाईचारा के साथ जिंदगी बसर होगी उनके हितों की रक्षा की जाएगी। वे पाकिस्‍तान चले गये। जैसा की पूर्व में बताया गया है, उन्‍हे पाकिस्तान संविधान सभा का अध्‍यक्ष बनाया गया, बाद में वे वहां के प्रथम कानून मंत्री भी बने। जिन्‍ना के मौत के बाद पाकिस्तान की स्थिति बदलती गई । जम्‍बूरियत के बजाय वहां की सत्‍ता में धर्म हावी होने लगा। पाकिस्‍तान के नेता एवं बड़े अफसर मंडल से भेदभाव करते थे। यहां तक की उनके कानून मंत्री रहते उनके ही सेक्रेटरी उनकी बात नही मानते थे। उन्‍होने देखा पाकिस्‍तान में हिन्‍दू दलितों के साथ ज्‍यादती हो रही है। शासन द्वारा रोक थाम के लिए कोई कदम नही उठाया जा रहा है। यही हाल पूर्वी पाकिस्‍तान (बंगलादेश) का भी था। उन्‍होने तत्‍कालीन प्रधान मंत्री चौधरी मोहम्‍मद अली को हिन्‍दू दलितों पर धार्मिक हमले की बात बताई। कई पत्र लिखे। लेकिन कोई कदम नही उठाया गया। तंग आकर उन्‍होने मंत्री पद से त्‍याग पत्र देकर भारत आ गये। कोलकाता के एक झोपड़ पट्टी इलाके में रहने लगे। चूंकि बंगाल में उनकी लोकप्रियता अभी भी थी। इसलिए उनके निवास पर भीड़ लगी रहती। लोग अपनी समस्या का समाधान करवाने ओउनके पास आवेदन लेकर जाते। वे मुख्‍यमंत्री प्रधान मंत्री को पत्र लिखते पर शायद ही किसी पत्रों पर कार्यवाही होती। उन्‍होने भारत में राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की बहुत कोशिश की। कई चुनाव लड़े पर वे सफल नही हो पाये।

दोनो तरफ से छले गये जोगेन्‍द्रनाथ

जोगेंद्र नाथ मंडल जिस हिन्‍दू जाति व्यवस्था ऊंच नीच, भेदभाव, जातीय प्रताड़ना से तंग आकर समता समानता, बराबरी पाने की आशा में मुस्लिम लीग की ओर गए। लेकिन वहां पर भी उन्हें शिवाय धोखे के कुछ न मिला। उनके साथ बहुत सारे हिंदू दलित भी पूर्वी पाकिस्तान चले गए। उनके साथ बहुत जुल्म हुए, अत्याचार की सीमा नहीं रही, हत्याएं बलात्कार का सिलसिला चलता रहा। पाकिस्तान से उन्हें भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।अंत में गुमनामी की जिंदगी गुजारते हुए 5 अक्टूबर 1968 मे उनकी मौत हो गई। उनकी मौत पर किसी भी बड़े नेता ने उन्हें याद नहीं किया। 

उनकी मौत पर बहुत सारे सवाल खड़े हुए जोगेंद्र नाथ मंडल के बेटे जगदीश मंडल ने कहा कि उनकी मौत स्वाभाविक नहीं थी उन्होंने हत्या की आशंका व्यक्त कि। बहरहाल जोगेंद्र नाथ की जिंदगी पर नजर डालें तो यह बात सामने खुलकर आती है की दलित समुदाय का हितैषी आखिर कौन है क्यों जिनके सहारे वे पाकिस्तान गए उन लोगों ने ही उनका साथ नहीं दिया।  प्रश्न यह भी उठता है कि भारत के बड़े नेता होने के बावजूद क्यों वे यहां भी भेदभाव का शिकार होते रहे हैं? प्रश्न यह है कि आखिर वंचित समाज का हितैषी कौन है क्यों वंचित समाज के लोग हर जगह छले जाते हैं। इस प्रश्न का जवाब ढूंढना होगा। 


Ramanika Gupta's departure is an accident, she wanted to live more.

 रमणिका गुप्ता का जाना एक हादसा है वो और जीना चाहती।

संजीव खुदशाह
लंबे समय से बीमार रही रमणिका गुप्ता का निधन हो गया। उनकी बीमारी की हालत में मैं उनसे कई बार मिलने गया और यह महसूस होता था कि वह और जीना चाह रही हैं। थोड़ा बहुत भी ठीक होती तो भि‍ड़ जाती अपने कामों में, समय पर मैगजीन युद्ध रत आम आदमी आना है। कौन सा काम कैसा  हो रहा है? एक तरह से उन्हें अपने जाने का भी एहसास हो चुका था। क्योंकि उमर उनकी काफी हो रही थी। वह अपने तमाम राइटिंग्स और स्पीच को इकट्ठा कर रही थी। इसके प्रकाशित करने की तैयारी में थी। शायद वह अब तक प्रकाशित भी हो गई होगी ।

बहुत सारे काम वे जल्‍दबाजी में करना चाह रही थी। हर जगह वह आप अपनी उपस्थिति देना चाहती थी। बता दूं कि रमणिका गुप्ता ने अपने कैरियर की शुरुआत हजारीबाग बिहार। अब झारखंड में है, से शुरू की थी। परिवार से विद्रोह करते हुए उन्होंने कोयला मजदूरों के लिए आंदोलन जारी रखा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी से वह विधायक चुनी गई। उनके जज्बे और साहस की हमेशा तारीफ में होती थी। इसके साथ साथ उन्होंने अपना साहित्यिक काम भी जारी रखा। वह हजारीबाग से ही युद्ध रात आम आदमी पत्रिका निकालती थी। शुरू में यह त्रैमासिक थी ।
उन्हें अपने नाम का बेहद मोह था जैसा कि सभी को होता है। लेकिन वह उसे प्रजेंट करने में कभी भी संकोच नहीं करती थी। उन्होंने अपने जीते जी रमणिका फाउंडेशन बनाया और खुद उसकी संस्थापक सदस्य बनी। रमणिका फाउंडेशन के मार्फत वे कई विधाओं में पुरस्कार भी दिया करती थी। पत्रिका का प्रकाशन भी रमणिका फाउंडेशन के माध्यम से ही होता था।
उन्होंने आदिवासी मुद्दों पर जमकर लिखा और इस पर लिखने वालों को आगे भी बढ़ाए। इसी प्रकार वे दलित मुद्दों पर भी काफी लिखा करती थी और दलित लेखकों को प्रमोट करने का श्रेय उन्हें जाता है। उनकी कविताएं और कहानियां चर्चित रही हैं खासकर उन की एक कहानी बहू जुठाई बेहद चर्चित रही है। यदि मौका मिले तो आप इस कहानी को जरूर पढ़ें।
वे स्त्री मुद्दों को उठाने वाली देश की अग्रणी महिलाओं में शुमार की जाती थी । उनकी तमाम रचनाओं में महिला वादी सोच स्पष्ट दिखाई पड़ती थी। उनकी आत्मकथा हादसे बेहद चर्चित रही। उन्होंने अपने अंतरंग संबंधों और तमाम अनुभवों को इस आत्मकथा में साझा किया था। जिसके कारण वह विवादों में भी घिरी थी।
मेरा जब भी दिल्ली जाना होता मैं रमणिका जी के पास जरूर आता और प्रभावित था कि वे एक बुजुर्ग महिला होने के बावजूद बेहद सक्रिय थी। रात को केवल 4 या 5 घंटे सोती, बाकी समय लिखने पढ़ने में जाता। उनकी पत्रिका का विशेषांक मल मूत्र ढोता भारत के लिए। मैं कई बार दिल्ली गया और इस काम में मैंने मदद की। इसके बाद मैंने पिछड़ा वर्ग विशेषांक संपादन का जिम्मा लिया और क़रीब 4 साल की मेहनत के बाद यह अंक मार्केट में आया। इस बीच मुझे कई बार रायपुर से दिल्ली का दौरा करना पड़ा। तमाम लोगों से इंटरव्यू एवं आलेख मंगाए गए। रचनाओं की छटनी और प्रूफ चेकिंग। एक बहुत बड़ा काम था। यह अंक दो भागों में प्रकाशित हुआ।
 एक बार की घटना मुझे याद आ रही है रमणिका जी को जब पता चलता कि कोई दिल्‍ली के बाहर से लेखक या लेखिका आई हैं। तो उन्हें फोन कर बुला लेती और गपशप मारते हैं। कुछ लिखना पढ़ना होता। इसी दरमियान कंवल भारती जी को उन्होंने फोन पर बुलवाया और उन्होंने कहा कि भारती जी अब आप आ जाइए शाम का खाना खाएंगे कुछ रम शम पिएंगे। कंवल भारती जी ऑटो में तुरंत डिफेंस कॉलोनी स्थित रमणिका जी के निवास पर आ गए। एक-दो दिन पहले से मैं भी वहां पर था। जैसे ही कंवल भारती आए तो उन्होंने स्वागत सत्कार किया और बातचीत करने लगे। कंवल भारती जी ने कहा कि आपने मंगवा लिए (इशारा रम की तरफ था) तो रमणिका जी तुरंत कहने लगी कि नहीं हम तो आजकल लेना बंद कर दिए हैं और यहां पर पिलाना भी बंद हैं। तो कंवल भारती जी तमक गए बोले कि आप ने मुझे बुलाया है, यही बोल कर, इसलिए मैं आया हूं । सहमति के लिए रमणिका जी ने मुझसे हामी भराने की कोशिश की, तो मैंने कहा कि आपने तो कहा था कि आइए कुछ रम सम पिएंगे। रमणिका जी ने कहा कि ऐसा तो मैंने नहीं कहा था। उसके तुरंत बाद कंवल भारती जी नाराज हो कर चले गए। वह कई बार अपने कहे बातों को बदल दिया करती थी और कभी भी अचानक बहुत पैसे वाली हो जाती। तो कभी वे बिल्कुल गरीबों से व्यवहार करती। वह अक्सर कहां करती थी कि मेरे बेटे की कंपनी( जो अमेरिका में है) का टर्नओवर बिहार सरकार के टर्नओवर से ज्यादा है। उनका यह फाउंडेशन उन्हीं की मदद से चल रहा है। उनके यहां जो कर्मचारी काम करते थे उनमें से एक दिनेश को छोड़कर कोई भी कर्मचारी साल 6 महीना से ज्यादा नहीं टिक पाता था। वे रगड़ कर काम लेती थी और किसी भी कर्मचारी को फांके मानने का मौका नहीं देती थी। इसलिए संपादक से लेकर टायपिस्ट टिक नही पाते।
कोई कर्मचारी यदि उनके टेलीफोन से अपने रिश्तेदारों से फोन भी करता तो वह उनकी सैलरी से फोन के बिल के पैसे काट लिया करती। प्रोफेशनल तो इतनी थी कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते। यदि आप जानेंगे कि वे एक दलित आदिवासी और महिला वादी महिला थी। लेकिन इमोशनल तो बिल्कुल भी नहीं थी। कई बार उनके महिला वादी होने पर भी संदेह होता।
ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद आ रहा है।  एक नेपाली जोड़ा उनके यहां निवास करता था। उसकी पत्नी घर पर झाड़ू पोछा खाना वगैरह बनाने का काम करती थी और पति कहीं किसी कंपनी में चौकीदार था। इसी दरमियान बता दूं मैं की झारखंड हजारीबाग निवासी रमणिका जी के पुराने मित्र का बेटा आईएएस परीक्षा की तैयारी करने के लिए रमणिका का फाउंडेशन में साल भर से ठहरा हुआ था। नाम तो मुझे याद नहीं आ रहा है। लेकिन वह भूमिहार परिवार का था ऐसी जानकारी रमणिका जी ने दी थी। वह लड़का पढ़ाई कम और हीरोगिरी ज्यादा करता था। अक्सर रमणिका फाउंडेशन में आने वाली महिलाओं के पीछे पीछे घूमता रहता और नेपाल से आए उस नेपाली चौकीदार की पत्नी के भी पीछे-पीछे वह घूमा करता था। बाद में पता चला कि इस लड़के ने उस नेपाली महिला के साथ धमकी देकर जबरदस्ती संबंध बनाया और वह महिला प्रेग्नेंट हो गई।  यह जानकारी  उस नेपाली महिला के पति को नहीं हो पाई। क्योंकि वह आधी रात चौकीदारी की ड्यूटी से फाउंडेशन में आकर रुकता था यहां के एक छोटे से कमरे में नेपाली जोड़े को निवास हेतु जगह दिया गया था।  रमणिका फाउंडेशन में हंगामा मच गया। जैसा की होना चाहिए था। इस मामले में रमणिका जी के द्वारा पुलिस में रिपोर्ट लिखा जाना चाहिए था। लेकिन हुआ इसके उलट, वह महिला लगातार रोती रही और पुलिस में जाने की कोशिश करती रही। लेकिन रमणिका जी ने उन्हें डांट कर रोका और उस मामले मैं लीपापोती कर के उसे रफा-दफा कर दिया गया। एक प्रकार से रमणिका जी ने उस भूमिहार बलात्कारी लड़के को बचाने की पूरी कोशिश की जिसमें वह पूरी तरह सफल हो गई। उनके इस व्यवहार से उनके महिला वादी होने पर संदेह होता रहा है मुझे। मैं नहीं समझ पाया कि वह अपने लिखने, कहने और विचारधारा के उलट कैसे व्‍यवहार कर सकती हैं।
जैसा कि मैंने पहले बताया है कि वह फ्रंट में रहने के लिए कुछ भी किया करती। एक बार उन्होंने मुझे फोन किया संजीव जी आमिर खान से संपर्क करो। उन्होंने जो सत्य में जयते पर सफाई कामगारों के लिए एपिसोड बनाया है। उसमें मुझे भी ले ले मैंने भी तो मल मूत्र ढोता भारत पत्रिका विशेषांक निकाला था। इस तरह वे अपने असिस्टेंट उसे फोन करवाती। जिस पर में उन्हें कोई संकोच नहीं था। वह किसी भी संपादक को यदि लेख भेजती, तो उन्हें फोन जरूर करवाती है। जैसे उन्होंने यदि 10 संपादकों को लेख भेजा है। तो अपने असिस्टेंट से उन्हें फोन करने के लिए कहती है और वे स्वयं बात करती। वे जिस प्रकार लाल सलाम बोलने में संकोच नहीं करती थी ठीक उसी प्रकार वह जय भीम बोलने में भी संकोच नहीं करती थी। डॉक्टर अंबेडकर के द्वारा किए गए प्रयासों को वह खुले दिल से स्वीकार करती थी और उन्हें मंचों पर साझा भी करती । सक्रियता उनकी सबसे बड़ी खूबी रही है वह बेहद प्रोफेशनल और सक्रिय महिला थी। मौत के कुछ दिनों पहले भी वह मंचों पर देखी गई और जज्बे के साथ अपने बातों को भी रखती थी। उनका जाना निश्चित रूप से साहित्य और विचारधारा की दुनिया में एक बड़ी खाई है जिसकी क्षतिपूर्ति आसान नहीं है।

Lok Sabha General Elections 2024: Democracy and Religious Minorities ram puniyani

 लोकसभा आमचुनाव 2024: प्रजातंत्र और धार्मिक अल्पसंख्यक

 -राम पुनियानी

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में खाने-पीने का सामान बेचने वाली सभी दुकानों में नेमप्लेट लगाने के आदेश – जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रोक लगा दी – की तुलना रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका और नाज़ी जर्मनी से की गई. नाज़ी जर्मनी में यहूदियों को अपनी दुकानों और व्यवसायों को चिन्हित करने पर मजबूर किया गया और इसके बाद उनका अत्यंत क्रूरतापूर्ण दमन हुआ.  

सन 2024 के आमचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनावी ताकत में कमी आई. वह बहुमत हासिल नहीं कर सकी. इससे यह आशा जागी थी कि बहुवाद और विविधता जैसे प्रजातान्त्रिक मूल्य एक बार फिर मज़बूत होंगे.

चुनाव प्रचार के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह अहसास हो गया था कि राममंदिर कोई जादू की छड़ी नहीं है जो उनकी पार्टी की झोली को वोटों से भर देगी. और इसलिए उन्होंने समाज को बांटने वाले प्रचार का सहारा लेना शुरू कर दिया. उन्होंने इंडिया गठबंधन पर आरोप लगाया कि अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल करने के लिए वह उनके आगे मुजरा कर रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि इंडिया गठबंधन संविधान में संशोधन कर अनुसचित जातियों / जनजातियों और ओबीसी के लिए आरक्षण समाप्त कर देगा और उनके लिए निर्धारित कोटा, मुसलमानों को दे दिया जाएगा.

हिन्दुओं को आतंकित करने के लिए उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू महिलाओं का मंगलसूत्र उनसे छीन कर मुसलमानों को दे दिया जायेगा. उन्होंने इस तरह की कई बातें कहीं. मगर नफरत फैलाने की यह कोशिश भाजपा के काम नहीं आई और लोकसभा में उसकी सीटों की संख्या 303 से घट कर 240 रह गई.

इससे यह आशा जागी कि अब अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिशों में कमी आएगी और सामाजिक सद्भाव बढेगा. मगर एनडीए (जिसका सबसे बड़ा घटक भाजपा है) सरकार के शासनकाल के पिछले कुछ हफ़्तों के घटनाक्रम ने इन आशाओं पर पानी फेर दिया है. बल्कि, भाजपा नेताओं और सरकार की कथनी-करनी से ऐसा लग रहा है कि वे अपनी पुरानी हरकतों से बाज आने को तैयार नहीं हैं.   

असम के मुख्यमंत्री श्री हेमंत बिस्वा सरमा, जो नफरत फैलाने वाली बातें कहने के लिए कुख्यात हैं, ने कहा कि असम जल्दी ही मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य बन जायेगा. उनके अनुसार, राज्य की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत सन 1951 में 12 प्रतिशत था (बाद में उन्होंने इसे 14 प्रतिशत बताया), जो अब 40 प्रतिशत हो गया है. ये आंकड़े झूठे हैं और इनका उद्देश्य केवल हिन्दुओं को डराना है. सच यह है कि सन 1951 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 24.68 था और 2011 की जनगणना के अनुसार, 34.22. पुरानी आदतें जल्दी छूटती नहीं हैं.  

पश्चिम बंगाल, जहाँ भाजपा को मुंह की खानी पड़ी और उसके लोकसभा सदस्यों की संख्या 18 से घट कर 12 रह गयी, में पार्टी नेता सुवेंदु अधिकारी भाजपा की सीटों में गिरावट के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराते हैं. उन्होंने घोषणा की, "हमें सबका साथ – सबका विकास की बातें करने की ज़रुरत नहीं है. हमें तो यह कहना चाहिए कि जो हमारा समर्थन करेगा, हम उसका समर्थन करेंगे." भाजपा परिवार के कई सदस्यों ने अधिकारी के बयान से असहमति दर्शाई मगर जो उन्होंने कहा वह निश्चित तौर पर पार्टी के वास्तविक राजनैतिक लक्ष्यों का खुलासा करता है. 

इससे से भी एक कदम और आगे बढ़कर, उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में डीआईजी ने निर्देश दिया कि कांवड़ यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली खाने-पीने का सामान बेचने वाले दुकानों और होटलों को उनके मालिकों और कर्मचारियों के नाम की पट्टी लगाना आवश्यक होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने 21 जुलाई को उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड की सरकारों द्वारा जारी किये इस निर्देश के अमल पर रोक लगा दी. न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और एस.वी.एन. भट्टी की एक खंडपीठ ने इस सम्बन्ध में एक अंतरिम आदेश जारी किया.

प्रशासन के अनुसार यह कदम उन "हिन्दू श्रद्धालुओं की आस्था की पवित्रता की रक्षा करने के लिए उठाया गया है, जो सावन के महीने में कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं." उत्तर प्रदेश के बाद उत्तराखंड की सरकार ने भी यही निर्देश जारी किया. इसके बाद भाजपा की अन्य सरकारें भी ऐसे ही निर्देश जारी करने की जुगत में थीं, जिससे धीरे-धीरे यह नियम व्यापक रूप से लागू हो जाता.   

जब इस कदम की आलोचना हुई तो राज्य सरकार ने कहा कि नाम लिखना वैकल्पिक होगा. यह श्स्यद पहला ऐसा सरकारी आदेश होगा जिसका पालन करना ऐच्छिक है! देश के सर्वोच्च नेता और प्रधानमंत्री ने इस आदेश के मामले में चुप्पी साध रखी है. इससे ऐसा लगता है कि उनकी पार्टी की यही नीति है. इस निर्णय का भाजपा के गठबंधन साथियों जैसे जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने भी विरोध किया. मगर उससे भू कुछ नहीं हुआ. साफ़ है कि मोदी के लिए गठबंधन दलों की राय का कोई महत्व नहीं है.

यह शायद भाजपा द्वारा लिया गया सबसे ज्यादा निर्णायक कदम है. इससे कांवड़ यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली होटलों में मुसलमान कर्मचारियों को निकालने का सिलसिला शुरू हो गया है. सच तो है कि शुद्धता और प्रदूषण जैसी अवधारणाओं की आज के समय में कोई जगह नहीं है. हरिद्वार से गंगा का पानी भरकर उसे विभिन्न शिवमंदिरों में ले जाने की परंपरा काफी पुरानी है. मगर पिछले कुछ दशकों में, विशेषकर 1980 के दशक के बाद से, इसने बहुत जोड़ पकड़ लिया है. राममंदिर आन्दोलन से शुरू हुई धर्म की राजनीति का समाज में बोलबाला बढ़ने के साथ-साथ कांवड़ यात्रा में भागीदारी भी बढ़ी है. अब लाखों-लाख लोग इन यात्राओं में भाग लेते है.

बहरहाल, इस तरह के आदेश का क्या नतीजा होता? कई लोगों ने इस आदेश की तुलना दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार और जर्मनी की नाज़ी सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों से की है. नाज़ी जर्मनी में फासीवादी नीतियों के निशाने पर यहूदी थे. उन्हें उनकी दुकानों के सामने स्टार ऑफ़ डेविड लटकाने और अपने शरीर पर पहनने के लिए कहा गया. इससे उनकी पहचान करना और उन्हें प्रताड़ित करना आसान हो गया. कांवड़ यात्रा के बारे में यह निर्णय शायद एक प्रयोग था और आगे चलकर भाजपा सरकारें ऐसे कदम उठा सकतीं हैं जिनसे मुसलमानों की पहचान करना आसान हो जाए.

ऐसा लग रहा है कि देश की राजनीति में सांप्रदायिकता का ज़हर घुल चुका है. भाजपा और उसके गठबंधन साथियों को चुनाव में हराना, देश में बहुवाद की पुनर्स्थापना की ओर पहला कदम है. मुसलमानों के राजनैतिक प्रतिनिधित्व में कमी लाने के साथ-साथ उन्हें निशाना भी बनाया जा रहा है. आरएसएस-भाजपा के नेताओं का कहना है कि वे मुस्लिम राजनीति को साम्प्रदायिकता से मुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं.

कांवड़ यात्रा सम्बन्धी आदेश से साफ़ है कि यह दावा शुद्ध पाखण्ड है. वे यह नहीं बताते कि भाजपा का एक भी लोकसभा सदस्य मुसलमान क्यों नहीं है और यह भी कि मंत्रीपरिषद् में एक भी मुसलमान को क्यों शामिल नहीं किया गया है. उनका दावा है कि वे अब पसमांदा मुसलमानों से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. क्या उन्हें पता है कि भाजपा की राजनीति के सबसे बड़े शिकार कौन हैं? अगर सुप्रीम कोर्ट आदेश पर रोक नहीं लगाता तो निर्णय का सबसे ज्यादा खामियाजा पसमांदा मुसलमानों को ही भोगना पड़ता.  

इंडिया गठबंधन को इस तरह के क़दमों का जम कर विरोध करना चाहिए. यह ज़रूरी है कि समावेशी मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए और उन प्रतिगामी नीतियों के खिलाफ संघर्ष किया जाए जो समाज को बांटने वाली हैं और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की ओर कदम हैं. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

 

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