Tuesday, 13 January 2026

Shri Ramratan Janorkar's ideology and his social struggle

 

श्री रामरतन जानोरकर की विचारधारा और उनका सामाजिक संघर्ष

भरत लाल छड़ीले 'वेद', बिलासपुर

(विषय पर गोष्ठी दिनांक 27-12-2025, वृंदावन भवन, सिविल लाइन, रायपुर मे दिया गया भाषण)

मंच पर विराजमान परम आदरणीय श्री महादेव कावरे जी संभाग आयुक्त रायपुर श्री हरीश जानोरकर जी लेखक सामाजिक कार्यकर्ता नागपुर, श्रीमति विन्नी खुद‌शाह जी, सामाजिक कार्यकर्ता रायपुर, श्री रतन गोंडाने जी , प्रमुख समता सैनिक दल रायपुर, श्री वीरेंद्र कुमार ढीढी जी, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता आप सभी को प्रणाम करता हूं। सभागार में उपस्थित सभी बुद्धिजीवियों को मेरा प्रणाम । अपने विचारों की श्रृंखला को आगे बढ़ाने से पहले आज की चर्चा के स्तम्भ पुरुष परम श्रद्धेय आदरणीय रामरतन जानोरकर जी जो आज हमारे बीच नहीं हैं, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए शत शत नमन करता हूं। सुधिजनों, बाबू रामरतन जानोरकर जी के पूर्वज बांदा उत्तरप्रदेश के गांव राजपुर के वाशिंदे थे। मनुवादीयो के अत्याचार से पीड़ित हो कर वहाँ से लोग पलायन कर देश के अन्य स्थानों में शरण लिये । बाबू रामरतन जी अपने पिता जी के साथ महाराष्ट्र के नागपुर में अपना ठौर ठिकाना चुना । बाल्यावस्था में ही माता-पिता का साया उन्होंने खो दिया था। एक लम्बे परिवार के लालन-पालन की जिम्मेदारी बाबू रामरतन जी के कांधे पर थी। वे मजबूर हो कर सफाई मजदूर का काम करके परिवार का भरण पोषण किये, साथ में पढ़ाई भी जारी रखी । बाल्यकाल से जुल्म उत्पीड़न शोषण को भोगते हुए उन्होंने दलितों को देखा है, खुद उसके शिकार हुए। उनकी प्रतिभा, विद्धता व शौर्य अदभुत था । वे दलित उद्धारक राजनीति से जुड़ते चले गए। नागपुर के शेडुल कास्ट स्टुडेण्ट फेडरेशन के सचिव बने। छात्र आंदोलन में बढ़ चढ़‌ कर भाग लेने के कारण उनका आत्मबल बुलंद हो चला था। वे बाबू हरिदास आवड़े कामरेड के संसर्ग में आकर उनके अधिनस्थ पूरी आस्था अनुशासन से कार्य किये। 1951-52 में बौद्ध धर्म में उनकी दिलचस्पी होने लगी। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित हुए और 1956 में बाबा साहेब के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा लिए । 1957 में रिपब्लिकन पार्टी के गठन में इनका योगदान अतुलनीय रहा। वे एक कार्यकर्ता के रूप में पूरी लगन व कर्मठता से निरंतर कार्य करते रहे। 1975 में भारतीय बौद्ध महासभा में वे शामिल हुए तथा 1976 में नागपुर महानगरपालिका के महापौर बन कर गौरवान्वित हुए। मेयर बनने के बाद सफाई कर्मचारियों की जर्जर आर्थिक दशा को सुधारने की दिशा में उत्तरोत्तर कार्य किये । उन्होंने मेहतर को आपरेटिव सोसाइटी का गठन कर एक अभूतपूर्व कार्य किया, जिससे सफाई कर्मचारियों के आर्थिक सहयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस संस्था में आज की स्थिति में करोड़ों का लेन देन हो रहा है, जो उनकी एक महान उपलब्धी थी। वे अंतर्जातीय विवाह के लिए जोर देते थे, ताकि संस्कार सभ्यता परिष्कृत हो मेल-मिलाप का रास्ता खुले और सामाजिक स्तर का पुनरुद्धार हो सके तथा आत्म विश्वास प्रबल हो सके, संगठन शक्ति में इजाफा हो सके। वो कहने से ज्यादा करने पर विश्वास करते थे, और इसी सिद्धान्त के तहत उन्होंने अपनी शादी और अपने बच्चों की शादी अंतर्जातीय वर्ग में किया । इतना ही नहीं पूरे परिवार को बौद्ध धर्म से जोड़ा । वे एक सच्चे ईमानदार समाज सेवक व सुधारक थे। उनके नेतृत्व में दलित समाज के कल्याण की दिशा में कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए। 

वे नशे की प्रवृत्ति से कोसों दूर रहे और नशा उन्मूलन के लिए काम किया। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए देश के कई स्थानों का भ्रमण किया और रचनात्मक कार्य किया। शिक्षा को उन्होंने विशेष महत्व दिया, और इस संबंध में विशेष मुहिम चला कर दलितों को जागृत करते रहे। वे जीवन पर्यन्त एक छोटे से मकान में रहे। एक मेयर होते हुए सादगी परस्त रहे और संत दृष्टि व ईमानदारी के पर्याय रहे । बाबा साहेब के विचार व आंदोलन उर्जा उनकी रक्त शिराओं में बहता था। वे सदैव संगठन के प्रति वफादार रहे, और एक अनुशासित सिपाही की तरह काम करके इतिहास रचने में सफल रहे। महाराष्ट्र सरकार उनकी कर्मठता, जीवटता, सक्रियता से प्रभावित हो कर उन्हें "बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द‌लित मित्र" सम्मान से सम्मानित किया ।

बाबू रामरतन जानोरकर जी की विचारधारा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से प्रभावित थी। उन्हें इस बात का संज्ञान था कि बाबा साहेब के क्रांतिकारी विचारधारा के जरिए ही दलितों का उत्थान संभव है। जब तक शिक्षा संगठन और संघर्ष की त्रिधारा को दलित अपने जीवन का मूल मंत्र नहीं बनाएंगे तब तक दलित, प्रवंचना उत्पीड़न शोषण दोहन से मुक्त नहीं हो पाएंगे। इसीलिये वे दलित आंदोलन के सजग सचेतक बन कर उभरे। वे इसके पक्षधर थे कि हमें राजनीतिक लोकतंत्र तो मिल गया है पर सामाजिक लोकतंत्र मिलना शेष है। उन्होंने अपने विचारों में वक्तव्यों में इस बात पर जोर दिया था कि शिक्षा के बिना राजनीतिक जागरुकता और आर्थिक सामाजिक उन्नति पाना असंभव है, इसलिये हम आधी रोटी खाएं पर बच्चों को पढ़ाएं। बाबू रामरतन जी बाबा साहेब के इस बात से भी प्रभावित थे कि जब तक दलितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सत्ता में नहीं होगा, तब तक नीतियां शोषितों के पक्ष में नहीं बन पाएगी और इसी मूल मंत्र के बदौलत बाबु रामरतन जी राजनीति में पदार्पण किये और नागपुर के मेयर बने । बाबू रामरतन जानोरकर दलित समुदाय के अधिकारों के एक बुलंद आवाज थे। वे बौद्ध धर्म स्वीकार करके सत्य अहिंसा करुणा को आत्मसात किये और जीवन पर्यन्त आदर्श स्थापित किये। डोमार समाज से लेकर समस्त दलित समाज के के शुभचिंतक थे और उनके उत्थान के लिए कई हितकारी कार्य किये।

 आज के परिवेश में हम यह देख रहे हैं कि देश में किस तरह साम्प्रदायिक सदभावना धराशायी हो रही है। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं का ताल ठोका जा रहा है। हिन्दू राष्ट्र का अलख जगाया जा रहा है। आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। यह सब राजनैतिक पाखण्ड की साजिश है जो देश की अखण्डता को परस्पर भाईचारे को कमजोर कर रही है। इस भयावह संकट के संक्रमण काल में दलितों की वैचारिक मानसिक शक्ति का एक होना निहायत जरूरी है, नहीं तो हमारा अस्तित्व बच पाना मुश्किल होगा। एक होना एक आवाज बनना आज की परम आवश्यकता है। मनुवादी विचारधारा किस तरह सुनियोजित तरीके से संगठित हो रही है और कैसे कैसे हथकण्डे अपना कर हमारे लोगों को दिग भ्रमित कर अपने जाल में फांस रही है यह सर्व विदित है। इस पर चिंतन-मनने की जरूरत है। इतना ही नहीं हमें भी सुनियोजित योजना के साथ काम करने की आवश्यकता है। एक दूरगामी दीर्घकालिक मिशन पर कारगर कदम उठाने की जरूरत है। इस दिशा में हमारे नौजवानों को विशेष तौर से गंभीरता पूर्वक शांतिपूर्वक रचनात्मक सार्थक क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत है। इस संबंध में हर विषय के विशेषज्ञों विद्वानों को जोड़ कर सशक्त कार्य योजना तैयार करने की जरूरत है, अमल में लाने की जरूरत है। साथियों आरक्षण कोई दान नहीं सामाजिक न्याय का संवैधानिक अधिकार है, जिसे तोड़ मरोड़ कर उसकी गति को बाधित किया गया है जो एक सोची समझी दांव है, ताकि हमें आरक्षण का कम से कम लाभ मिल सके। इतना ही नहीं शासकीय / सार्वजनिक संस्थानों का निजिकरण कर आरक्षण खत्म किया गया। शिक्षण संस्थानों का भी यही हाल है। शिक्षण संस्थानों का निजिकरण कर उसकी फीस अत्यधिक किये गये फलस्वरूप गरीब बच्चे दलितों के बच्चे न पढ़ पाएं। हमें ऐसा लगता है कि शिक्षा की नई नीति हमारी मौलिकता हमारे अस्तित्व को आघात पहुंचाएगी । इस नीति की अवधारणा' हमारी मानसिकता बोद्धिकता को बदल कर खतरनाक मोड़ की ओर ले जा सकती है। इस पर दलित मनीषियों को चिंतन करना चाहिए और आवाज उठाने की जरूरत है। इस तरह भीतरघाती योजना के द्वारा हमे धीमा जहर दिया जा रहा है, जिसका आभास बहुतों को नहीं है। इसका खुलासा जगह जगह चिंतन शिविर लगा कर किया जाना चाहिए । योग्यता जन्म से नहीं आती अवसर से आती है और हमारे अवसर के रास्ते बंद किये जा रहे हैं। दलित आरक्षण की बदौलत योग्यता तक पहुंच बना कर समानता की ऊंचाई को छू सकता है, यह तथ्यपरक सत्य है। देश की जनसंख्या 146 करोड़ से अधिक है, जिसमें ब्राम्हणों की संख्या 5% है। इतनी कम संख्या वाले लोग अपनी बुद्धिमानी से 95% लोगों पर राज कर रहे हैं, भारी पड़ रहे हैं। इस देश में यह उनकी विशेषता है । हमें उनसे कोई गुरेज नहीं है न ही कोई  ईर्ष्या  रखनी चाहिए बल्कि उनसे हमें सबक सीखने की जरूरत है और उनकी स्पर्धा में आगे आने की जरूरत है। आप खुद सोचिये कि इस देश में बिना स्पर्धा परीक्षाओं के IAS/IPS बनाया जा रहा है क्या यह सही है।

 मेरा तो यह मानना है कि छुआछूत भेदभाव, जाति घ्रणा और नफरत तब खत्म होगी जब वर्ण व्यवस्था की समस्त जातिया खत्म कर दी जाएं । केवल धर्म आधारित वर्ग संकेत हो जैसे इसाई, बौद्ध, हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, जैन आदि । तभी समानता का भाव उदित होगा। ऊंच नीच की भावना खत्म होगी। अगर ऐसा होता है तब आरक्षण आर्थिक आधार पर किया जाना चाहिए। मैं पुनः इस बात पर जोर दूंगा कि सभी संगठन मिल कर एक एकीकृत केन्द्रीय संगठन बनाएँ, जिसके प्रस्ताव को सारे संगठन मानें पालन करें। जब तक हम एक सूत्र मे नहीं बंधेंगे, तब तक हमारा कल्याण संभव नहीं है न ही बाबा साहेब का मिशन कामयाब कर पाएंगे। सभी संगठन को दुराग्रह से ऊपर उठ कर इस पर विचार करना चाहिए। इसका यह मतलब नहीं है कि क्षेत्रीय संगठन खत्म हो जाएंगे । वे सभी अपना अपना काम करते रहेंगे, किंतु जब केन्द्रीय संगठन कोई स्टेप सर्वसम्मति से ले तो उसका अक्षरशः पालन सभी संस्थाएँ करें। निःसंदेह ऐसा करने से हमारी शक्ति बढ़ेगी, और सत्ता में भूचाल लाने में समर्थ हो सकेंगे। तभी हमारी बात सत्ता मानने के लिए विवश होगी।

 अंत में माटी पुत्र डोमार समाज के वैभव विभूति बाबू रामरतन जानोरकर जी के शौर्य, पराक्रम, अवदान, चिंतन, दर्शन जिजीविषा और जीवन मूल्यों को मैं सलाम करता हूं और उनके व्यक्तित्व को नमन करता हूं तथा करुणामयी भगवान बुद्ध से प्रार्थना करता हूं कि बाबू जैसा सच्चा सपूत हर घर घर में हो ऐसा विधान चाहता हूँ। अब मैं अपनी बात इस ध्येय पंक्तियों से खत्म करता हूँ;

 हवा के रुख को बदलते हैं बदलने वाले 

खार का ताज पहन करके महकते हैं महकने वाले

 हौसला हो अगर दरिया को पार करने का 

बुलंदी पाते हैं हर हाल पे पाने वाले

 मुनिजनों, मैं कोई वक्ता नहीं हूं, एक नाटककार साहित्यकार: रंगकर्मा, सामाजिक चिंतक हूं। मुझे इस गरिमामय समारोह में बोलने योग्य समकी, बोलने का अवसर दिया, इसके लिए छत्तीसगढ़ डोमार समाज एवं डी एम ए इंडिया चैनल रायपुर का आभार व्यक्त करता हूँ। जय भारत, जय भीम, नमो बुद्धाय।

 

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