श्री रामरतन जानोरकर की विचारधारा और उनका सामाजिक संघर्ष
भरत लाल छड़ीले 'वेद', बिलासपुर
(विषय पर गोष्ठी दिनांक 27-12-2025,
वृंदावन भवन, सिविल लाइन, रायपुर मे दिया गया भाषण)
मंच पर विराजमान परम आदरणीय श्री महादेव कावरे जी संभाग
आयुक्त रायपुर श्री हरीश जानोरकर जी लेखक सामाजिक कार्यकर्ता नागपुर, श्रीमति
विन्नी खुदशाह जी, सामाजिक कार्यकर्ता रायपुर,
श्री रतन गोंडाने जी , प्रमुख समता सैनिक दल रायपुर,
श्री वीरेंद्र कुमार ढीढी जी,
लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता आप सभी को प्रणाम करता हूं।
सभागार में उपस्थित सभी बुद्धिजीवियों को मेरा प्रणाम । अपने विचारों की श्रृंखला
को आगे बढ़ाने से पहले आज की चर्चा के स्तम्भ पुरुष परम श्रद्धेय आदरणीय रामरतन
जानोरकर जी जो आज हमारे बीच नहीं हैं, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए शत शत नमन करता हूं।
सुधिजनों, बाबू
रामरतन जानोरकर जी के पूर्वज बांदा उत्तरप्रदेश के गांव राजपुर के वाशिंदे थे।
मनुवादीयो के अत्याचार से पीड़ित हो कर वहाँ से लोग पलायन कर देश के अन्य स्थानों
में शरण लिये । बाबू रामरतन जी अपने पिता जी के साथ महाराष्ट्र के नागपुर में अपना
ठौर ठिकाना चुना । बाल्यावस्था में ही माता-पिता का साया उन्होंने खो दिया था। एक
लम्बे परिवार के लालन-पालन की जिम्मेदारी बाबू रामरतन जी के कांधे पर थी। वे मजबूर
हो कर सफाई मजदूर का काम करके परिवार का भरण पोषण किये, साथ में
पढ़ाई भी जारी रखी । बाल्यकाल से जुल्म उत्पीड़न शोषण को भोगते हुए उन्होंने
दलितों को देखा है, खुद उसके शिकार हुए। उनकी प्रतिभा, विद्धता
व शौर्य अदभुत था । वे दलित उद्धारक राजनीति से जुड़ते चले गए। नागपुर के शेडुल
कास्ट स्टुडेण्ट फेडरेशन के सचिव बने। छात्र आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लेने के
कारण उनका आत्मबल बुलंद हो चला था। वे बाबू हरिदास आवड़े कामरेड के संसर्ग में आकर
उनके अधिनस्थ पूरी आस्था अनुशासन से कार्य किये। 1951-52 में बौद्ध धर्म में उनकी दिलचस्पी होने लगी। बाबा साहेब
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित हुए और 1956 में
बाबा साहेब के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा लिए । 1957 में
रिपब्लिकन पार्टी के गठन में इनका योगदान अतुलनीय रहा। वे एक कार्यकर्ता के रूप
में पूरी लगन व कर्मठता से निरंतर कार्य करते रहे। 1975 में भारतीय बौद्ध महासभा में वे शामिल हुए तथा 1976 में
नागपुर महानगरपालिका के महापौर बन कर गौरवान्वित हुए। मेयर बनने के बाद सफाई
कर्मचारियों की जर्जर आर्थिक दशा को सुधारने की दिशा में उत्तरोत्तर कार्य किये ।
उन्होंने मेहतर को आपरेटिव सोसाइटी का गठन कर एक अभूतपूर्व कार्य किया, जिससे
सफाई कर्मचारियों के आर्थिक सहयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस संस्था में आज की
स्थिति में करोड़ों का लेन देन हो रहा है, जो उनकी एक महान उपलब्धी थी। वे अंतर्जातीय विवाह के लिए
जोर देते थे, ताकि संस्कार सभ्यता परिष्कृत हो मेल-मिलाप का रास्ता खुले
और सामाजिक स्तर का पुनरुद्धार हो सके तथा आत्म विश्वास प्रबल हो सके, संगठन
शक्ति में इजाफा हो सके। वो कहने से ज्यादा करने पर विश्वास करते थे, और इसी
सिद्धान्त के तहत उन्होंने अपनी शादी और अपने बच्चों की शादी अंतर्जातीय वर्ग में
किया । इतना ही नहीं पूरे परिवार को बौद्ध धर्म से जोड़ा । वे एक सच्चे ईमानदार
समाज सेवक व सुधारक थे। उनके नेतृत्व में दलित समाज के कल्याण की दिशा में कई
क्रांतिकारी कदम उठाए गए।
वे नशे की प्रवृत्ति से कोसों दूर रहे और नशा उन्मूलन के
लिए काम किया। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए देश के कई स्थानों का
भ्रमण किया और रचनात्मक कार्य किया। शिक्षा को उन्होंने विशेष महत्व दिया, और इस
संबंध में विशेष मुहिम चला कर दलितों को जागृत करते रहे। वे जीवन पर्यन्त एक छोटे
से मकान में रहे। एक मेयर होते हुए सादगी परस्त रहे और संत दृष्टि व ईमानदारी के
पर्याय रहे । बाबा साहेब के विचार व आंदोलन उर्जा उनकी रक्त शिराओं में बहता था।
वे सदैव संगठन के प्रति वफादार रहे, और एक अनुशासित सिपाही की तरह काम करके इतिहास रचने में सफल
रहे। महाराष्ट्र सरकार उनकी कर्मठता, जीवटता, सक्रियता से प्रभावित हो कर उन्हें "बाबा साहेब डॉ.
अम्बेडकर दलित मित्र" सम्मान से सम्मानित किया ।
बाबू रामरतन जानोरकर जी की विचारधारा बाबा साहेब डॉ.
अम्बेडकर की विचारधारा से प्रभावित थी। उन्हें इस बात का संज्ञान था कि बाबा साहेब
के क्रांतिकारी विचारधारा के जरिए ही दलितों का उत्थान संभव है। जब तक शिक्षा
संगठन और संघर्ष की त्रिधारा को दलित अपने जीवन का मूल मंत्र नहीं बनाएंगे तब तक
दलित, प्रवंचना
उत्पीड़न शोषण दोहन से मुक्त नहीं हो पाएंगे। इसीलिये वे दलित आंदोलन के सजग सचेतक
बन कर उभरे। वे इसके पक्षधर थे कि हमें राजनीतिक लोकतंत्र तो मिल गया है पर
सामाजिक लोकतंत्र मिलना शेष है। उन्होंने अपने विचारों में वक्तव्यों में इस बात
पर जोर दिया था कि शिक्षा के बिना राजनीतिक जागरुकता और आर्थिक सामाजिक उन्नति
पाना असंभव है, इसलिये हम आधी रोटी खाएं पर बच्चों को पढ़ाएं। बाबू रामरतन
जी बाबा साहेब के इस बात से भी प्रभावित थे कि जब तक दलितों का पर्याप्त
प्रतिनिधित्व सत्ता में नहीं होगा, तब तक नीतियां शोषितों के पक्ष में नहीं बन पाएगी और इसी
मूल मंत्र के बदौलत बाबु रामरतन जी राजनीति में पदार्पण किये और नागपुर के मेयर
बने । बाबू रामरतन जानोरकर दलित समुदाय के अधिकारों के एक बुलंद आवाज थे। वे बौद्ध
धर्म स्वीकार करके सत्य अहिंसा करुणा को आत्मसात किये और जीवन पर्यन्त आदर्श
स्थापित किये। डोमार समाज से लेकर समस्त दलित समाज के के शुभचिंतक थे और उनके
उत्थान के लिए कई हितकारी कार्य किये।
खार का ताज पहन करके महकते हैं महकने वाले
हौसला हो
अगर दरिया को पार करने का
बुलंदी पाते हैं हर हाल पे पाने वाले
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