रामसिंह खरे जी की किताब श्री सुदर्शन सूपा भक्त का पुर्नपाठ
संजीव खुदशाह
इस दुर्लभ किताब के बारे में बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि दलितों का एक बड़ा समूह सुदर्शन ऋषि को मानता था और उसी नाम से पहचाना जाता था। इसकी शुरुआत इस किताब के लेखक राम सिंह खरे ने की थी। इस किताब को पढ़ने से मालूम होता है कि उस समय की स्थिति क्या थी और किन विचारधाराओं से वे प्रभावित थे उस समय डोमारो की क्या स्थिति थी कौन-कौन सी कुरीतियां थी जिन्हें वह ठीक करना चाहते थे। हालांकि बाद में यह समाज डॉक्टर अंबेडकर के आंदोलन से जुड़ गया।
राम सिंह खरे जी की लिखी हुई किताब श्री सुदर्शन सूपा भक्त 3 जनवरी 1932 में प्रकाशित हुई थी प्रकाशक थे पंडित राधा रमन पांडे केसरी प्रेस 2/3 चितरंजन एवेन्यू कलकत्ता। आज जिस समय यह लेख लिखा जा रहा है पूरे 94 वर्ष इस किताब के हो गए हैं। इसमें लेखक के रूप में सेवक रामसिंह सो. नी. बी. एन. रेलवे लिखा हुआ है। ज्ञातव्य है कि राम सिंह खरे जी रेलवे में सर्विस करते थे। ब्रिटिश इंडिया के समय में रेलवे निजी सर्विस हुआ करती थी। इसीलिए बंगाल नागपुर रेलवे लिखा हुआ है। किताब में उनका नाम सिर्फ राम सिंह लिखा गया है।
1930 का भारतीय परिदृश्य
इस समय अंग्रेजों का शासन हुआ करता
था और दलित आंदोलन अपने उत्कर्ष में था डॉ आंबेडकर कलाराम मंदिर 2 मार्च 1930 आंदोलन कर चुके थे नवंबर 1930 प्रथम गोलमेज सम्मेलन हो चुका था। इस समय महात्मा गांधी नमक
सत्याग्रह कर चुके थे सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। स्वराज और
स्वदेशी की भावना देश में लहर मार रही थी। सितंबर 1932
में पूना पैक्ट होने के बाद गांधी
ने अछूतोद्धार का कार्यक्रम चालू किया और अछूतों को हरिजन के नाम से संबोधित किया।
यह किताब जनवरी 1932 में लिखी गई यानी जब इस किताब को
लिखा गया गांधी का हरिजन आंदोलन शुरू नहीं हुआ था। लेकिन डॉक्टर अंबेडकर के दलित
आंदोलन का प्रभाव देश में सुर्खियां बटोर रहा था।
किताब श्री सुदर्शन सूपा भक्त कुल 40 पेज की है शुरुआती 6 पेज में गजल लिखे गए हैं। सातवें
पेज से गद्य की शुरुआत होती है । पृष्ठ क्रमांक 7
में लेखक राम सिंह जी लिखते हैं
"प्रिय पाठक गण, हमारी डोमार कौम, आज इस संसार में बिल्कुल गिरी हालत में है। इसका कारण यह है
कि हम विद्या विहीन है, अगर विद्या है भी तो बिल्कुल थोड़ी, बुद्धि न होने की वजह से हम समझते हैं, कि हम कुछ नहीं कर सकते और न किसी ने किया, सो यह कहना या सोचना बिल्कुल भूल है, क्योंकि भाई हमारे काम में महात्मा सुदर्शन सुपा भक्त हुए
हैं, महात्मा जी का जन्म स्थान जिला रीवा गांव चंदवारा में हुआ
था उनके माता जी का नाम लक्ष्मी और पिताजी का नाम नरहर था।" इस तरह वे
सुदर्शन ऋषि की पूरी कथा लिखते हैं। इस कथा को उन्होंने कहां से लिया है इसका
जिक्र यहां नहीं है वह इस किताब में अपने आप को सेवक के रूप में संबोधित करते हैं
और छोटी-छोटी बुराइयों के बारे में लिखते हैं जिसे वह कहते हैं कि समाज इससे मुक्त
होना चाहिए।
शराब से मुक्ति की बात
पृष्ठ क्रमांक 12 में वे लिखते हैं कि "आप लोगों से पूछता हूं कि आप लोग
पंचाइती के रुपए से धर्मशाला, पाठशाला, मंदिर वगैरह बनाए हो, नहीं भाई जी कोई नहीं। सिर्फ हमारी
जाति में तमाम रूपयों का शराब पीने की बाजी में सबसे आगे हैं। सेवक यह कह नहीं
सकता कि कितना रूपयों का भाइयों ने शराब पी लिया होगा और फालतू खर्च में नुकसान कर
दिया होगा और अभी तक होता जाता है तो है पाठक गण अब आप ही विचार कर लीजिए कि हम
लोगों को नफा क्या मिला?" याने वह उस वक्त समाज में व्याप्त
नशाखोरी से परेशान थे और वे जानते थे कि यही समाज के पतन का कारण है। गरीबी का
कारण है, अशिक्षा का कारण है। वे नशाखोरी से दूर करने के लिए प्रेरित
कर रहे थे।
छुआछूत की कमी और बलि प्रथा
पृष्ठ क्रमांक 13 में वे लिखते हैं कि "एक दिन वह था कि हमारे भाइयों को
गांव बस्तियों में जाना मुश्किल था फिर कुछ दिनों की बात छुआछूत का भूत भागने लगा
और आज दिन ऐसा अमूल्य समय आया है कि हम लोगों के लिए कई शहरों में मंदिरों के
दरवाजे खुल गए हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर की पूजा करने के लिए। सो भाइयों अब हमें भी
उसे परम कृपालु परमात्मा का भजन करना जाना चाहिए। जिसकी सारी सृष्टि बनाई है। अब
तो काम यह है कि हमारे प्यारे नौजवान भाइयों जहां हमारी कौम वा जाति की कुरीति से
पूजा होती है। उसे रोके, या कुचलन से पूजा नहीं करना चाहिए।
हम लोग जो जीव काटते हैं मंदिर का धार देते हैं सो बिल्कुल भूल हैं" इस तरह
भी बताते हैं कि छुआछूत की भावना लोगों में कम हो रही थी। मंदिरों में और गांव में
डोमारो को प्रवेश नहीं मिलता था। वह शुरू हो चुका है। साथ में यह भी कहते हैं कि
पूजा के नाम पर जो बली दे दी जाती है। उसे बंद करना चाहिए। शाकाहार का प्रयोग करना
चाहिए। इस समय तक डॉक्टर अंबेडकर का आंदोलन देश भर में फैल चुका था हिंदुओं ने
मंदिरों के द्वार खोलने शुरू कर दिए थे। उस समय पूजा पाठ करने वाले धार्मिक
व्यक्तियों को श्रेष्ठ समझा जाता था इसका प्रभाव राम सिंह खरे पर स्पष्ट दिखाई
पड़ता है और वह इस और समाज को प्रेरित करते हुए दिखते हैं।
सामाजिक दंड
वह पृष्ठ क्रमांक 22 और 23 में सामाजिक बहिष्कार और समाज में
मिलाने के लिए दंड के बारे में चर्चा करते हैं और कहते हैं कि हमारा समाज बहुत
गरीब है और इन्हें ज्यादा रुपए दंड के रूप में नहीं लेना चाहिए। वह रुपए कहां से
लाएंगे। उन्हें थोड़ा बहुत दंड देकर या फिर बिना दंड दिए समाज में मिला लेना
चाहिए। पंचायत प्रथा के बारे में वे बताते हैं कि ₹100
का दंड बहुत बड़ा दंड है। उस समय ₹100 में 4 एकड़ भूमि मिल जाती थी। इतने भारी
भरकम रकम से दंडित करने पर हमारे समाज की हालत और खराब हो जाएगी।
हिंसक पशुओं द्वारा मारे गए
उस समय डोमार समाज की स्थिति बहुत
खराब थी वह कई बार भूख से इतने व्याकुल होते थे की जंगली जानवरों से शिकार के लिए
संघर्ष करते थे। हिंसक जानवर जिन पशुओं को मार कर छोड़ देते थे उनके आहार से डोमार
अपना पेट भर पाते थे। राम सिंह खरे लिखते हैं कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए । हमें
जानवरों का आहार नहीं छीनना चाहिए। हम ऐसे मांस के लिए आपस में भी लड़ पड़ते हैं
और एक दूसरे को मारते हैं यह गलत है। इससे पता चलता है कि भोजन के लिए
डोमार समाज के सदस्यों को बहुत संघर्ष करना पड़ता था।
महिलाओं के बारे में विचार
वह पृष्ठ क्रमांक 27 में लिखते हैं "प्रिय पाठक चलिए हम अपनी माता बहनों का
हाल देखें सुने कि वे बिचारी आज संसार में बिल्कुल गवारी गिनी जा रही हैं सो किस
लिए इसका कारण तो मेरी अल्प बुद्धि में आता हैं कि सुसंगत और विद्या का हम लोगों
में प्रचार नहीं अगर कोई अपनी लड़कियों को पढ़ाने के लिए भेजे तो हमारे बुद्धिमान
भाई कहा करते हैं लड़कियों को मत पढ़ाओ नहीं तो खराब हो जाएगी। ऐसा करना भूल
है" स्त्रियों की शिक्षा को लेकर जोर देते थे। पृष्ठ 28 में वह कहते हैं की शादी विवाह में महिलाओं को नाचना गलत है
इससे बेज्जती होती है। खास करके वे शादी में जो गंदे गाने गाती है जिसमें गालियां
होती हैं ऐसा गाना गाना बिल्कुल गलत है।
इसके बाद पृष्ठ क्रमांक 30 से लेकर 35 तक कविता और गीत लिखे गए हैं। पृष्ठ क्रमांक 36 में वे लिखते हैं कि "प्यारे
मित्रों आप लोगों से बार-बार विनती करता हूं की कहीं भूल हो उसे सुधार लीजिए और आप
लोगों से दो एक बाते कहना है सो लिखता हूं। भाई हमारे बहुत से भाई-बहन तो बड़ी
सफाई बताते हैं कि हम धोबी, चमार का छुआ खाना नहीं खाते। लेकिन
मित्रों घर में स्त्री मासिक धर्म से होती है तो उसी के हाथ का भोजन करते हैं क्या
ऐसा करना ठीक है हरगीज नहीं। इसे भी त्याग दीजिए और कृपया करके ईश्वर की संध्या
शुरू कीजिए वा हर एक भाई को सिखाए और आदि शक्ति माता के चरणों में शीश नवा कर जात
भाइयों की सेवा कीजिए। मेरी भूल क्षमा कीजे, आपका तुछ सेवक राम सिंह"
मासिक धर्म के बारे में उस समय उच्च जातियों में जो परंपरा थी इसका प्रयोग करने के
लिए वह जोर दे रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ की वह इसे विज्ञान की दृष्टि से नहीं देख
पा रहे हैं। जबकि शासक अंग्रेजो में ऐसा कोई
चलन नहीं था। न ही ऐसा चलन छोटी जातियों में था।
पृष्ठ क्रमांक 36 पर ही वह अपने बारे में लिखते हैं "आजा पिता पुत्र
जीला गांव ईशरी मैकू राम सिंह बांदा जरधनी (अस्पष्ट) सहावा मित्रों आपको मालूम है
कि मंडली का काम 12 मई 1928
से चल रहा है सेवको ने कई शहरों
में जाति सुधारने की विषय में मीटिंग भी किए थे और तारीख 12 जून 1930 में सुपा भगत व सुदर्शन सेवा मंडली
के नाम से काम चालू है और आपके कृपा से चल भी रहा है अगर हम हर एक भाई एक कायदे से
सम्मति से रहेंगे तो हम लोग भी दुनिया में सुख से जीवन व्यतीत करेंगे" यहां
पर उनका समर्पण दिखता है कि वह किस प्रकार से डोमार समाज को आगे बढ़ाने के लिए
प्रयास कर रहे थे। इस किताब में कहीं पर भी डोमार को छोड़कर दूसरी जातियों का
विवरण नहीं मिलता है न ही वे दावा करते हैं कि 27
जातियों को जोड़ना है या उन्हें
जोड़कर आगे बढ़ाना है।
वह हर एक शहर के कार्यकर्ताओं का
नाम भी इसमें लिखते हैं
जैसे बाबू मिठाई लाल बिलासपुर से, बिलासपुर से ही बाबू मदारी बाबू फदाली, मोहनलाल, रायपुर से बाबू जंगी मास्टर, बाबू प्रसाद, बाबू मगुह, खड़कपुर में बाबू मोहन, बाबू शिवपाल, सुखदेव, शिवरतन, धन्नूलाल और बाबू भीम्मा,
छोटू सखीदार, शंकर पहलवान, लालू राम। शहर ढाका में बाबू सुंदर
दास, गज्जू लामा वाला, ब्रह्मादिन, माधो, बुधु। धौला में सोना, गोंदिया में बेनी, गटई जमादार, जगन्नाथ, जबलपुर में रामअधीन जमादार, कटनी में रामदयाल बाबू सुदीन बाबू बापू छोटेलाल भगवान दिन, तेंदवार में गज्जू।
जिन किताबों से सामग्री ली गई है
उसका भी विवरण यहां पर दिया गया है, कबीर मंसूर, पूरान दर्पण, जाति भास्कर, वाल्मीकि रामायण, वैश्य कुलभूषण इतिहास, राम सिंह 3 जनवरी 1932।
पृष्ठ के अंत में सुदर्शन सेवा
मंडली की रीति लिखी गई है ।
1. ईश्वर प्रार्थना हर सेवक को सिखाना पढ़ाना व्यायाम सीखना
धर्म शिक्षा सीखना परोपकारी बनाना ।
2. कार्यकर्ता को चाहिए कि सावधानी से काम चलावे और वैशाख
अमावस्या को सुदर्शन बाबा को गरूवा का झंडा चढ़ाना। गुरु मुनेंद्र व ईश्वर की पूजा
करना वेद विधि या शक्ति कुछ बिरादरों के बाल बच्चे व बिरादरी सहित पंचायती रुपया
से बच्चों को खिलौने भी बाटे जाएं।
3. लाभदायक सरीयते भी हो, उचित पारितोषिक दिया जाएगा।
पंचायती रुपया से सब काम होना चाहिए।
4. सेवक का काम है कि हर हालत में बिरादरों की सेवा करें
5. गुनाही भाइयों को मामूली दंड में मिलाने की कोशिश करें।
6. हर एक बहन बिटिया को अपनी माता बहिन के अनुसार देखें और
किसी तरह का कष्ट न होने देना चाहिए।
7. जहां कहीं पंचाइती हो वा बिरादरों में खाना शादी विवाह
इत्यादि हो तो कार्यकर्ता सेवको सहित जाकर सहायता उचित अनुसार करें।
8. आपस में तकरार ना होने पावे।
9. हर हमेशा अपने भाइयों को अच्छे कर्म की शिक्षा देते रहें
10. हर एक लड़के व लड़कियों को विद्या पढ़ाना चाहिए।
11. पंचाइती रूपयों से व चंदा से स्कूल व मंदिर बनाना चाहिए।
यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिससे यह पता चलता है कि उस वक्त अनुसूचित जातियों में क्या चल रहा था। यहां पर धोबी और चमारों से छुआ करने का विवरण मिलता है। इसका मतलब यह है कि अछूत जातियां भी आपस में एक दूसरे से छुआछूत का पालन करती थी। अंग्रेज शासन के बारे में राम सिंह खरे जी बिल्कुल मौन है। वह कुछ भी नहीं कह रहे हैं। लेकिन अपने समाज को आगे बढ़ाने की तीव्र इच्छा स्पष्ट दिखाई पड़ती है।
किताब के प्रकाशन दिनांक को लेकर भ्रम
इस किताब में पृष्ठ क्रमांक 38 में राम सिंह 3 जनवरी 1932 लिखा हुआ. इससे यह भ्रम होता है कि यह किताब 1932 में प्रकाशित हुई है. जबकि पृष्ठ क्रमांक 37 में जिन लोगों का जिक्र हुआ है उनमें से बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता मिठाई लाल का जिक्र है। मिठाई लालजी का रेलवे से रिटायरमेंट 1989 में हुआ है इस हिसाब से 60 साल पहले उनका जन्म 1929 में हुआ रहा होगा। 1932 में मिठाई लालजी सिर्फ 3 साल के रहे होंगे। भले ही राम सिंह खरे ने उन लेखो को पहले लिखा रहा होगा या जो उन्होंने एक्टिविटी की उसका दिनांक सही हो सकता है लेकिन पुस्तक प्रकाशन का दिवस 1965 के बाद का प्रतीत होता है।


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