Monday, 12 January 2026

क्या-क्या न गुजरी डोमारों पर

 क्या-क्या न गुजरी डोमारों पर

नरेन्द्र पुण्डरीक

मैं ऐसे गाँव का रहने वाला है जहां आधे से अधिक आबादी ब्राह्मणों की है और आधे से कुछ अधिक दलित वर्ग के लोग रहते हैं। बाकी अन्य सवर्ण जाति के लोग है। सभी लोग साल भर गाँव के बगल से बहती सदावाही नदी केन में रचे बसे रहते थे। क्या बच्चे क्या जवान, क्या बूढ़े, क्या औरते. क्या लड़कियां केन नदी सभी की प्रिय थी। नदी के किनारे पर रहने वाले सवर्ण व दलित लोग सभी अब से करीब डेढ दशक पहले नदी का ही पानी पीते थे और सारा निस्तार नदी के पानी से ही करते थे । गाँव के दूसरे किनारे पर रहने वाले लोगों के लिए गांव से बाहर लगा हुआ एक ही मीठे पानी का कुआँ था, जहां से सभी गाँव के लोग पानी भरते थे। गाँव के भीतर एक दो कुएँ थे जिनका पानी बहुत खारा था। इसलिए इस अकेले मीठे पानी के कुएँ में सुबह पांच बजे से रात दस बजे तक औरतों व आदमियों का अच्छा खासा जमघट लगा रहता था। शादी विवाह के अवसरों पर तो पानी भरने वाले कहारों का आधे कुएँ में कब्जा हो जाता था ।

इस कुएँ में केवल सवर्ण जाति के लोग ही पानी भरते थे, या वे लोग जिन्हें छूने में सवर्णों को परहेज नहीं होता था। दलित वर्ग के लोग इस कुएँ की जगत में नहीं चढ़ सकते थे। मैंने हरिजन औरतों, मर्दों, बच्चों को इस कुएँ के नीचे खड़े होकर, एक-एक घडे पानी के लिए घंटों चिचियाते, विनती करते देखा है। किसी सवर्ण औरत या मर्द को उन पर दया आ जाती, तो वे इनके घड़े में दूर से पानी डाल देते। दूर से डालने की वजह से पानी लेने वाले हरिजन के कपड़े भी गीले हो जाते थे। इसके बावजूद ठंड में ठिठुरता हुआ वह व्यक्ति या स्त्री पानी देने वाले व्यक्ति को दुआ देता जाता था। कभी-कभी मैं देखता था कि घंटों चिरौरी विनती करने के बावजूद कोई उनके खाली बरतनों में पानी नहीं डालता था। सब अपना-अपना पानी भरने में लगे रहते थे। तब इन लोगो को गाँव से करीब एक फर्लांग दूर एक कुएँ से पानी लाना पड़ता था। यह कुआँ बहुत टूटी-फूटी हालत में था और उसकी जगत पर एक पीपल का पेड़ लगा होने का कारण उसमें पत्तियाँ, चिड़ियों के पंख और बीट गिरती रहती थी, जिससे पानी में बदबू आती थी। बरसात के दिनों में तो इंतेहा हो जाती थी, क्योंकि नदी का पानी बिलकुल गंदा हो जाता था। तब नदी किनारे रहने वाले सवर्ण लोग भी इसी अकेले कुएँ में पानी भरने के लिए आ जाते थे। सो दलितों को एक लोटा पानी मिलना भी मुश्किल पड़ता था। फलतः पूरे बरसात भर ये नदी का बरसाती पानी ही छान-छान कर पीते थे ।

मैंने पानी के लिए इन्हें कुएं के जगत के नीचे घंटों प्रतीक्षा करते देखा है, लेकिन कुएँ की जगत में कभी अकेले में रात में भी चढ़ने की हिम्मत करते हुए इन्हें नहीं देखा। 

यह देखकर मुझे भी अजीब सा लगता था। माँ से कभी पूछता भी, तो वे कहती-

"अरे ये डोमार-चमार है "।

"ये अधूत क्यों नहीं पानी भरते?" तो वे कहती "अरे तुम बुद्धू  हो"। इसका जवाब शायद माँ को नहीं सूझता था ।

 

उस समय मेरे गाँव में केवल पाँचवी तक ही स्कूल था। हमारे साथ चार-पाँच लड़के डोमारों के पढ़ते थे। दलितों में विशेषकर डोमारों के बच्चों को छूने में, परहेज किया जाता था। इन्हें स्कूल के अध्यापक बाकी बच्चों से काफी दूर बैठाते थे, जहाँ से ये लोग न ठीक से सुन पाते थे, न ब्लैक बोर्ड में लिखाई देख पाते थे। इनकी पिटाई भी बाकी बच्चों से अधिक होती थी। अध्यापक इन्हें छूते नहीं थे, छड़ी फेंक कर मारते थे । मारने के साथ-साथ गाली-गलौज व जाति सूचक शब्दों द्वारा भी अपमानित करते थे, जिन्हें सुनकर सवर्ण बच्चे हँसा करते थे। स्कूल में सफाई आदि का कार्य भी अध्यापक लोग इनसे ही करवाते थे। सवर्ण बच्चों को छोड़कर शेष सभी जाति के बच्चों को अध्यापक जाति सूचक शब्दों से अपमानित करते थे लेकिन हरिजनों के बच्चों के ऊपर यह अत्याचार विशेष रूप से होता था। इन सब का परिणाम शायद यह होता था कि कोई दलित वर्ग का बच्चा पांचवी तक नहीं पहुँच पाता था और बीच ही में स्कूल छोड़कर काम में अपने माँ-बाप का हाथ बटाने लगता था। अधिकांशतः दलितों के बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़कर सवर्णों के घरों के ढ़ोर-डंगर चराने का काम करने लगते थे ।

अक्सर मैं देखा करता था कि दलित वर्ग के बच्चों पर सवर्ण जाति वाले सामन्तों की नजरें लगी रहती थी। 10-20 साल के होते-होते इन बच्चों को ये सवर्ण, उनके माँ-बाप को प्रलोभन देकर रखते थे ।

डोमार और चमार दो जातियाँ ऐसी थीं, जिनके पास न रहने के लिए घर थे और न खेती आदि की जमीन। डोमारों के पास तो एक टूटी-फूटी झोपड़ी के अलावा जमीन बिलकुल नहीं होती थीं। अपने पेट के लिए वे पूर्ण रूप से सवर्णों पर आश्रित थे । चमारों की स्थिति भी कमोवेश इनके जैसी ही थी। ये सवर्णों के खेतों व घरों में पूरे साल भर काम करते और इसके एवज में आधा पेट भोजन ही जुटा पाते थे। यदि किसी दलित या चमार के पास बीघा दो बीघा जमीन होती भी थी. तो इन सवर्णों की नजर गिद्ध की तरह उस जमीन पर तब तक लगी रहती थी. जब तक वे उसे हड़प नहीं लेते थे। मैंने बचपन में इन चमारों व दलित वर्ग के लोगों को सवों के कार्यों में जुटे रहकर पुरी जिन्दगी खटते देखा है और बिमारी में तिल-तिल कर, मरते देखा है। काम लायक न रह जाने पर उस दलित की ओर कोई धोखे से पलट कर भी नहीं देखता । मरने पर उसकी एवज में मैंने उन्हें अपने नाबालिग बच्चों का हाथ सवर्ण मालिकों के हाथ में पकड़ाते देखा है और यह कहते भी सुना है मालिक अभी बच्चे है. इसको निवार लेना। इसे ले जाइये, यह मेरी जगह में आपकी सेवा करेगा ।

भंगी या डोमारों की औरते सुबह आठ बजे से उठकर सवर्णों के घरों मे जाकर उनका पायखाना उठाने का कार्य करती थीं। कुछ पुरुष निदलों की तरह बैठकर गप्प हाँकते थे या कुछ लोग दलिया, सूप वगैरह बनाने का काम करते थे। इनके बच्चे सूअर चराने का काम करते थे। पायखाना उठाने के कार्य में भी इन औरतों को बड़ी जलालत झेलनी पड़ती थी। उन्हें नग्न बैठा देखकर पायखाना उठाने वाली औरत शर्म से पानी-पानी हो जाती थी। कोई-कोई पुरूष तो अवसर पाकर वहाँ इनकी इज्जत पर हाथ डालने से नहीं चूकते थे। ऐसे किस्से मैंने सवर्ण पुरूषों को चटखारे लेकर सुनाते देखा है। पायखाना उठाने वाली औरतें दोपहर तक पायखाना उठाने का काम करती थी फिर नहा धोकर शाम को चार बजे से इन्हीं सवर्ण घरों से रोटी लेने के लिए आती थीं। यह रोटी इन औरतों को पायखाना उठाने की एवज में दी जाती थी, यह रोटी भी सवर्ण घरों से वैसी नहीं मिलती थी, जैसी वे स्वयं खाते थे। रोटियों की संख्या दो ही रहती थी। इन रोटियों के ऊपर बची-खुची थोड़ी दाल या सब्जी रख दी जाती थी। कभी सूखी रोटियाँ ही दे दी जाती थीं। यह रोटियां इतनी दुर से इनकी डलिया में फेंकी जाती थीं कि कभी-कभी उनमें रखा हुआ सालन भी जमीन में फैल जाता था, जिसे वह औरत जमीन से उठाकर और धूल झाड़कर रख लेती थी। कुछ घरों में रोटियां न देकर फसल आने पर कुछ अनाज में सही अनाज का औसत कम और सड़ा-घुन अनाज ही अधिक होता था। जो अधिक दबंग प्रवृति के लोग होते वे उन्हें पायखाना उठवाई भी नहीं देते थे । यदि ये लोग कभी धोखे से माँग भी बैठते थे, तो इन्हें दूसरी तरह से प्रताड़ित किया जाता था ।

रोटियाँ, जो इन्की औरतें उगाही करके ले जाती, यही इनके परिवार के भोजन का मुख्य आधार होती थीं। शादी-विवाह के अवसरों पर दलित पुरूष अपने बच्चों को लेकर सवर्ण लोगों के घर से बाहर दूर घूरे में बैठते थे। वहीं पर जूठी पत्तलें फेंकी जाती थीं। इनमें जो पूड़ी-सब्जी के कुछ बचे लड्डू आदि के टुकड़े होते थे, उन्हें ये लोग बड़े जतन से सहेज कर अपने लिए निकाल कर अपनी दलिया में रखकर ले आते थे । उस दिन इन लोगों के यहां इस जूठन से जश्न होता था। दो तीन दिन तक इसे बड़े चाव से खाया जाता था। बची हुई कुछ जूठन व पूड़ियों आदि को सुखा भी लिया करते थे और महीनों तक इसे खाते रहते थे ।

इन दो दलित जातियों में डोमारों की औरतों के ऊपर पूर्णतया अछूत होने की वजह से सवर्ण की नजर कुछ हटी रहती थी, क्योंकि इससे ज्यादा बदनामी का भय होता था, किन्तु चमार लोगों की औरते सवर्णों द्वारा पूरी तरह से खुले आम घर लुगाई की तरह ही उपयोग की जाती थीं। सवर्ण जाति के मुखिया लोग इस सबको देखते हुए भी अनदेखा किया करते थे। कई सवर्ण युवकों के, जिनके यहाँ इन चमारों की औरतों का आना-जाना होता था, उनके संबंधों के चर्चे मुखर रहते थे। यहाँ तक कि कुछ सवर्णों के चेहरे मोहरों से चमारों के बच्चों के चेहरों का मिलान गाँव के लफंगों द्वारा खूब रस लेकर किया जाता था। उस समय हमारे गाँव में चमारों का एक मुखिया था। सभी चमार लोग उनकी बहुत इज्जत करते थे, गाँव के सारे डंगरों का चमड़ा यह मुखिया उधेड़कर अपने पास रखता था, इसलिए उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी। मरे डंगरों के उठाने में, सवर्ण घरों से घसीटकर पशु को बाहर लाने में सभी चमार इस मुखिया की मदद करते थे। इसके ऐवज में गौंटिया यानी मुखिया नाम मात्र का कुछ इन्हें दे दिया करता था। सवर्णों को जानवर के बदले में वह दो जोड़ा पनही बनाकर देता था एवं साल भर बेगार में उनकी पनही वगैरह गाँठता रहता था ।

1962-63 के आसपास की बात है। इस गौंटिया यानी चमारों के चौधरी का लड़का एम.एल.ए. के लिए रिपब्लिकन पार्टी से खड़ा हुआ था। उस समय इस पार्टी का चुनाव चिन्ह संभवतः हाथी ही था। गाँव के सवर्णों ने उसका खूब पैसा उड़ाया खाया लेकिन वोट उसे न देखकर दुसरी पार्टियो को दिया। इस समय पहली बार मैंने प्रचार में व इस चौधरी के घर में बाबा भीमराव अंबेडकर का अत्याचारों के प्रति विद्रोह की भावना पैदा हुई। ये लोग सवर्णों के घरों में बेगार करने से कतराने लगे । गाँव शहर से नजदीक होने के कारण ये लोग शहर के भाव पर मज़दूरी की मांग करने लगे। मज़दूरी के लिए शहर भी जाने लगे। यह भावना शहर और कस्बों, तहसीलों से लगे गाँवों में उभरने लगी। फिर धीरे-धीरे इस वर्ग के नेता, जो  ज्यादातर  रिपब्लिकन पार्टी के थे - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में चले गये। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में यहाँ के भूमिधरों के उत्पीड़न के खिलाफ 12 जुलाई 1968 में जिला कचहरी में विशाल प्रदर्शन हुआ था, जिसको दबाने के लिए तत्कालीन प्रशासन ने आंदोलन की उग्रता से भयभीत होकर गोली चलवा दी थी। इसके बाद यहाँ चमारों ने सवर्णों के यहाँ बेगार करना, उनके मरे हुए डंगरों को उठाने आदि का कार्य बन्द कर दिया था। इसके लिए इस पूरे वर्ग को भूख और उत्पीडन का सामना करना पड़ा था ।

कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे के नीचे उस वक्त इन लोगों ने, यह महत्वपूर्ण नारा दिया था : 'धन और धरती बटकर रहेगी' । उस समय इन चमारों का नेतृत्व, दुर्जन भाई कर रहे थे, जो स्वयं भी इन्हीं के भांति निरक्षर और अनपढ़ थे । लेकिन अंततः यह जनान्दोलन बिखर गया और कई जातिवादी घटकों में बदल गया । जननेता की जगह अभिजन नेता की संस्कृति इन घटकों के बीच पैदा हुई, जो जननेता कम और घटकों के नेता अधिक सिद्ध हुए और अभिजनों की भाँति ही फलने-फूलने लगे ।

"अमर उजाला से साभार"

दलित उत्थान पत्रिका प्रथम अंक संपादक संजीव खुदशाह प्रकाशक दलित मूवमेंट एसोसिएशन रायपुर छत्तीसगढ़ प्रथम पृष्ठ क्रमांक 16

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