Thursday, 1 January 2026

There is a need for social reform in the upper caste society. sanjeev khudshah

 सवर्ण समाज में समाज सुधार की जरूरत

 

संजीव खुदशाह

 

देश में हिन्‍दू सवर्ण समाज पर समाज सुधार का काम कम ही हुआ है। ऐसी बात नही है कि सवर्ण समाज से कोई समाज सेवक नही हुये है । हुये है लेकिन वे सारे अपने सवर्ण समाज को छोड़कर दूसरे  समाजों को सुधारने में लगे रहे। जबकि सवर्ण समाज में समाज सुधार की बेहद जरूरत आज भी है। अभी तक की जानकारी में केवल एक ही व्‍यक्ति हुऐ है जिन्‍होने अपने ही समाज को सुधारने का बीड़ा उठाया था। वे थे राजा राम मोहन राय। हांलाकि उन्‍हे अपने समाज का ही विद्रोह झेलना पड़ा।  अंग्रेजो ने उनकी मदद की। उसके बाद कोई भी व्‍यक्ति भारत में सवर्ण समाज सुधारक नही बन सका।

सभी सवर्ण समाज सुधारको ने शोषित समुदाय (दलित आदिवासी पिछड़ा वर्ग) के बीच जाकर समाज सुधार का कार्य किया। इनमें तीन विचारधारा वाले लोग अपको मिलेगे 1 गांधीवादी विचार धारा 2 कम्‍युनिष्‍ट विचार धारा 3 खिचड़ी (गांधी और कम्‍युनिष्‍ट) विचार धारा। ज्‍यादातर लोग गांधीवादी विचारधारा के आधार पर लोगो को संगठित करनेशिक्षित करने की कोशिश करते रहे है। कुछ लोगो ने इसे व्‍यवसाय के रूप में भी अपनाया। दलित आदिवासियों के नाम पर एन जी ओ खोलाखूब नाम और पैसा कमाया।

इसी प्रकार अंधश्रध्‍दा पर भी सवर्णो ने खूब काम किया उनका भी कार्य क्षेत्र दलित आदिवासी पिछड़ा वर्ग ही रहा यानी शोषित तबका। डायन प्रथाझाड़-फूकगंडा-ताबीजटोना-टोटका पर उन्‍होने अंधविश्‍वास की मुहर लगा दी और विरोध करने गांव गांव गये। लेकिन अपने खुदके सवर्ण समाज में फैले अंधविश्‍वास  ज्‍योतिषजनेऊहोलीदिवालीपितृपक्षमृत्यु भोजकालसर्पजन्मकुंडलीमूर्तिपूजा के कर्मकाण्‍ड को उन्‍होने न सिर्फ मौन समर्थन दे दिया बल्कि एक प्रकार से उन्‍हे विज्ञान का दर्जा दे दिया। वे समानता की बात तो करते है लेकिन असमानता को स्‍थापित करने वाले तुलसीदास उनके अराध्‍य रहे है।

 

क्‍यों सवर्ण समाज में समाज सुधारक की जरूरत है?

 

पहले ये समझना जरूरी है कि आखिर क्‍यो सवर्ण समाज में  समाज सुधार की ज्‍यादा जरूरत है। डॉं अंबेडकर कहते है कि *समस्‍या सवर्ण समाज में है अत: सुधार वहां होना चाहिए।* लेकिन ये लोग वंचितों को सुधारने में लगे रहते है और सवर्ण समाज को शोषण की खुली छूट देते है। उन्होंने अपनी कृति ‘’जाति प्रथा का उच्‍छेद’’ के दूसरे संस्करण की भूमिका में गांधी के सवालों का जवाब देते हुए लिखा था कि ‘’दुनिया को उन विद्रोहियों का शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने धर्म गुरुओं के सामने खड़े होकर तर्क वितर्क किया और उन्हें बताया कि आप गलत भी हो सकते हैं। मुझे नहीं मालूम कि किसी प्रगतिशील समाज में जो श्रेय विद्रोहियों को मिलता है वैसा श्रेय मुझे मिलेगा या नहीं। मैं अगर हिंदुओं (यानी सवर्णों) को यह समझा पाया कि वह भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी की वजह से देश के बाकी लोगों की सेहत को खतरा है। तो मैं समझूंगा कि मैंने अपना काम कर दिया।‘’ 1937  *एन्‍हैलेशन आफ कास्ट*

 

इसी प्रकार प्रसिध्‍द सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार (शर्मा) अपने फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं कि ‘'मेरा जन्म एक सवर्ण हिंदू परिवार में पुरुष के रूप में हुआ है इसीलिए मेरा दायित्व है कि मैं सवर्ण हिंदुओं और पुरुषों की समस्या पर सबसे पहले ध्यान दूं। जैसे जातिवाद सवर्णो की समस्या है दलितों की समस्या नहीं।’ 30 अप्रैल 2020 फेसबुक पोस्ट

यानी शोषित को सुधार की जरूरत नहीं बल्कि शोषणकर्ता को सुधारने की जरूरत ज्यादा है। 

 

आइए जानने की कोशिश करते हैं कि सवर्ण समाज के समाज सुधार में किन-किन बिंदुओं को लिया जाना चाहिए।

 

(1) *जातिवाद*- सवर्ण समाज का जातिवादी होनाजाति पर गर्व करनाजाति आधारित फायदे लेना आम है। उनकी जातिय अहम को छेड़ने  मात्र से वे तिलमिला जाते हैं। इसे पद्मावती फिल्म के विवाद को देखकर समझा जा सकता है। यह एक महत्वपूर्ण बुराई है। चूकिं सवर्ण समाज जाति व्यवस्था से लाभान्वित है इसलिए वह किसी ना किसी तरीके से उसे बनाए रखना चाहता है। इसके लिए वह संस्कृति का नाम लेता हैप्राचीनता की दुहाई देता है। जातीय अहम से बड़े बड़े सामाजिक कार्यकर्ता भी नहीं बच पाते है। वे लोग जो समानता की बात करते हैंजाति विहीन समाज की वकालत करते हैंवह भी अछूते नहीं हैं। किसी ना किसी प्रकार से अपनी जाति का प्रदर्शन करते रहते हैं।

सवर्णवादी तंत्र होने के कारण ऐसे लोग पैसेमान सम्मान से लेकर सरकारीगैर सरकारी पुरस्कार भी हासिल कर जाते हैं। कोर्ट से लेकर मीडियाप्रशासन तक सवर्ण समाज का कब्जा है। अपनी बिरादरी को येन-केन प्रकारेण फायदा पहुंचाना आम बात है।

आज तक सुई से लेकर हवाई जहाज तक कोई भी आविष्कार भारत में नहीं हुआ क्योंकि यहां का तथाकथित स्वर्ण समाजपढ़ने का हकदार समाजअविष्कार के बजाएं अपने जातीय अहम से गौरान्वित होना चाहता है। यह समस्या इतनी विकराल है कि इससे भारत की छवि खराब हो रही है। यह तथाकथित उच्च जातिय सवर्ण समाज संसार में जहां गया वहां इन बुराइयों को साथ ले गया। भारत तकनीकी मेंसमानता मेंभाईचारा मेंपिछड़ा हुआ है। सवर्ण समाज के भीतर जाति प्रथा का उन्मूलन अब तक किसी ने भी नहीं किया। ना इस पर कोई काम हुआ है। अब तक जितने भी सवर्ण जाति उन्मूलन कार्यकर्ता हैं वह सिर्फ दलित आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के बीच ही अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहते हैं। अपने समाज की बुराइयों से आंखें मूंद लेते हैं।

 

(2) *अंधविश्वास*- भारत में जाति प्रथा का ग्राफ देखें तो ज्ञात होता है कि जाति की उच्चता के साथ-साथ अंधविश्वास का ग्राफ भी बढ़ता जाता है। यानी छोटी जाति थोड़ा अंधविश्वास। ऊंची जाति में ज्यादा अंधविश्वास। उनमें ना केवल अंधविश्वास बढ़ता है बल्कि उसे मानने अपनाने की मजबूत प्रवृत्ति भी दिखाई पड़ती है। छोटी जाति के व्यक्ति को यदि आप समझाएंगे तो वह डायन प्रथाटोना टोटका को अंधविश्वास मानने लगेगा लेकिन ऊंची जाति के व्यक्ति को जनेऊज्योतिष में विज्ञान ही विज्ञान दिखता है। इसे अंधविश्‍वास के तौर पर बताएंगे तो वह बेकाबू हो जाता है। आश्चर्य की बात है कि अंधश्रद्धा पर काम करने वाले ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं या सवर्ण जातियों के है। चाहे आप महाराष्ट्र प्रदेशकर्नाटकमध्य प्रदेशछत्तीसगढ़उत्‍तरप्रदेश का उदाहरण देख ले। ये अंधश्रद्धा निर्मूलन/ तर्कशील कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों में दलित आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के बीच अंधश्रद्धा निर्मूलन का कार्य करते देखे जाते हैं। इनमें मुख्य मुद्दा होता है डायन प्रथाढोंगी बाबा का चमत्कारदेवी चढ़नाटोना-टोटकागंडा ताबीज आदि आदि। लेकिन यह सवर्ण कार्यकर्ता कभी ब्राह्मण ठाकुर की बस्तियों में जनेऊज्योतिषवेदों के बारे में जागरूकता फैलाते नहीं देखे जाते हैं जिन्हें अंधश्रद्धा से मुक्ति की ज्यादा जरूरत है। यानी सवर्ण या अधिक सटीकता से कहें तो ब्राह्मण समाज का अंधविश्वासअंधविश्वास नहीं बल्कि उनके चश्मे से उन्हें विज्ञान लगता है। दरअसल छोटी जातियों के लोग इन्हीं से देखकर अंधविश्वास सीखते हैं लेकिन बड़े-बड़े अंधविश्वास समितियों की अगुवाई करने वाले ब्राम्हण अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए गरीब क्षेत्रों में दलित आदिवासी और पिछड़ा वर्ग को ही चुनते हैं और अपने समाजपरिवार के अंधविश्वास को वैज्ञानिकता का मुहर लगा देते हैं।

लब्बोलुआब यह कि सवर्ण समाज को अपने ही लोगों के बीच में अंधश्रद्धा निर्मूलन का आंदोलन चलाना चाहिए। जिसकी वहां ज्यादा जरूरत है।

(3) *शोषणकारी प्रवृत्ति* - सवर्ण समाज की मनोवृति में मनुस्मृति बसी हुई है। दलित आदिवासी और पिछड़ा वर्ग का शोषण करना उसे एक सामान्य बात लगती है। बेगार लेनानीचा दिखानाबेइज्जत करना कोई अपराध नहीं माना जाता। एक सवर्णन्यायाधीश के तौर परएक अफसर के तौर परएक नेता के तौर पर जातिगत भेदभाव करता है। एक न्यायाधीश के तौर पर वह सवर्ण आरक्षण की छूट देता है लेकिन कैसा विरोधाभास है कि वहीं पर वह पिछड़ा वर्ग के आरक्षण पर रोक लगाता है। ऐसी तमाम घटनाएं देशभर में हो रही है जो इस बात की पुष्टि करती है कि हर स्तर में सवर्ण समाजभेदभाव जातिवाद बरतता है।

 

एक मीडिया प्रोफेशनल के तौर पर रवीश कुमार जैसे उदाहरण बताते हैं कि  दलित आदिवासी मुद्दे पर बात करने के लिए भी एक ब्राह्मण व्यक्ति ही चाहिए होता है। यानी दलित आदिवासी पिछड़ा वर्ग मुसलमान सभी की अगुवाई सवर्ण करता है। वंचित तबके को अपनी बात रखनेअगुआई करने से महरूम रखता है। मैंने यह बातें पढ़े-लिखे सवर्णो के बारे में की है। एक आम सवर्ण दलितों को घोड़ी में चढ़ने नहीं देताजूते में मूत्र पिलाता हैगोबर खिलाता है। मॉब लिंचिंग एक आम बात हो गई है। आखिर इनके बीच जाकर समाज सुधार कौन करेगाक्यों इनके बीच समाज सुधार का बीड़ा नहीं उठाया जाता हैयह एक बहुत बड़ा प्रश्न है।

 

(4) *यथास्थिति वादी* - ज्यादातर सवर्ण यथास्थितिवादी होते हैं। समाज में कोई भी बदलाव उन्हें स्वीकार नहीं है। अपने आप को प्रगतिशील कहने वाले लोग भी अपने जातीय लाभ के लिए सामाजिक परिवर्तन के प्रति चेतना शून्य हो जाते हैं। वह कहते हैं कि छुआछूत जाति प्रथा खत्म हो गई है। हम साथ बैठ उठ रहे हैं। पहले कहां होता था यह सब। कुरीतियों पर प्रश्न किए जाने पर कहते हैं यह तो सनातन काल से होता रहा है। वेद झूठ बोलेंगे क्या?

 

(5) *आरक्षण विरोधी रवैया* - सवर्णों का आरक्षण विरोधी होना एक प्रकार से मूल अधिकार रहा है। वे खुद मनु द्वारा दिये आरक्षण का लाभ सदियों से ले रहे है। आरक्षण के नाम पर दलित आदिवासियों पिछड़ा वर्ग के बारे में नफरत के बीज बोए जाते हैं। सवर्णों को चाहिए कि वे सामाजिक जनांकिकी के अनुसार प्रतिनिधित्व के रुप में आरक्षण के टूल को समझें उसकी जरूरत को महसूस करें। सैकड़ों सालों से उनके पूर्वजों द्वारा शोषित किए गए लोगों को प्रतिनिधित्व का अवसर दें। इस संबंध में सवर्णों के बीच जाकर काम करने की बेहद जरूरत है। इसके लिए उन्हीं के बीच के विचारको को आगे आना होगा। आरक्षित वर्ग के लिए उनके द्वारा ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिनसे उनकी नफरत झलकती है  जैसे- सरकारी दामादआरक्षण खोरहराम का खाने वाले। यह सवर्णों की स्पष्ट बेईमानी है कि 70 साल से आरक्षण के बावजूद आज भी आरक्षित वर्गों को उनके हिस्‍से का प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है जबकि उनकी जनसंख्या के मुताबिक 85% आरक्षण होना था। सवर्ण 15% होने के बावजूद 85% संस्थानों में कब्जा जमाए हुए हैं। आज भी लोकतंत्र के चारों खंभे में उन्हीं का वर्चस्व है।

 

यह वह चंद बिंदु हैं जिन पर सवर्णों के बीच काम करने की जरूरत है। और भी बिंदुओं को यहां पर जोड़ा जा सकता है। जाहिर है यह काम कोई दलित आदिवासी या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति नहीं कर सकता। इसके लिए स्वर्ण समाज के बीच से ही किसी वाल्टेयर को खड़ा होना होगा। मैं उन लोगों की ओर आशा भरी निगाह से देखता हूं जो इन्हीं मुद्दों को लेकर दलित आदिवासियों पिछड़ा वर्ग के बीच जाते हैं।  वह अपने समाज के बीच भी कुछ काम करें ताकि भारत समतामूलकप्रबुद्ध भारतविज्ञाननि‍ष्‍ठ भारत बन सके। शोषण और अत्याचार का दौर रुक सके। पता नहीं कब ऐसा होगा?

यदि ऐसा नहीं होता है तो हमें संविधान सभा में बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा अपने अंतिम भाषण में  सामाजिक असमानता को लेकर दी गई गंभीर चेतावनी को बार बार याद करना चाहिए।

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