जानिए
कौन है जोगेंद्र नाथ मंडल
संजीव
खुदशाह
पाकिस्तान
संविधान सभा के पूर्व अध्यक्ष एवं पाकिस्तान के ही प्रथम कानून मंत्री के रूप में
सेवाएं दे चुके जोगेंद्र नाथ मंडल को आज लगभग भुला दिया गया है। वह नमो शूद्र
(दलित) समाज के लोकप्रिय नेता थे और उन्होंने बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के
साथ मिलकर अछूतोंद्धार के लिए बहुत काम किया था। आइए आज हम जानने की कोशिश करेंगे
की वह कौन थे और क्यों उन्होंने पाकिस्तान छोड़कर फिर से भारत में शरण ली।
अपनी
स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बिरिसाल की नगर पालिका से अपने
राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की। उन्होंने निचले तबके के लोगों के हालात सुधारने के
लिए संघर्ष शुरू कर दिया।
जोगेंद्रनाथ
मंडल नामोशुद्र समुदाय से आते थे। नामोशुद्र हिंदू जाति व्यवस्था के बाहर की जाति
के रूप में मान्यता थी सरल शब्दों में इन्हे अछूत भी कह सकते है। बंगाल के
भद्रलोक द्वारा इनका शोषण किया जाता था। बेगार प्रथा, घृणित
काम के लिए दबाव दिया जाता था। लेकिन अपनी बेहतर स्थिति के लिए इन्होंने एक आंदोलन
शुरू किया था। नमो शूद्रों को पहले चांडाल कहा जाता था। चांडाल जाति बंगाल की
बहुसंख्यक अछूत जाति में गीनी जाती है। आंदोलन में इन्होंने गंदे काम और बेगारी
करने से मना कर दिया। अपने आपको चंडाल के बजाए नमो शूद्र कहना प्रारंभ किया।
चांडाल
जाति की लोगों ने 1901 में बंगाल की अंग्रेज सरकार से अभ्यावेदन देकर अनुरोध किया
कि उन्हें जाति पदानुक्रम में बेहतर स्थान दिया जाए। चांडाल के बजाय उन्हें नमो
शूद्र के नाम से पुकारा जाए। उनकी मांग को स्वीकार कर लिया गया। तब से चांडालों को
नमो शूद्र के नाम से मान्यता मिलने लगी।
जोगेन्द्र
नाथ मंडल ने 1937 के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के
रूप में बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन
क्षेत्र से बंगाल विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार
को हरा दिया। बाद में मंडल ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिया। कांग्रेस पार्टी में
उच्च जाति (भद्र लोक) के द्वारा उनके साथ भेदभाव होने लगा। उन्होंने यह सोचा कि जब
उनके हितों की रक्षा नहीं हो सकती। तो फिर उनके लोगों की हितों की रक्षा कैसे होगी?
यह
सोचकर उन्होंने मुस्लिम लीग ज्वाइन कर लिया। उन्हे मोहम्मद अली जिन्ना का करीबी
माना जाता था। मंडल ने बंगाल में अखिल भारतीय शिड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन के साथ काम
किया जिसके राष्ट्रीय नेता बाबा साहेब आंबेडकर थे.
डॉ
अंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
वे
डॉक्टर अंबेडकर से काफी प्रभावित थे । संविधान सभा के लिए जब मुंबई से डॉक्टर
अंबेडकर को जीत नहीं मिली तो उन्होंने बंगाल की अपनी सीट खुलना से डॉक्टर अंबेडकर
को उपचुनाव लड़ने के लिए दिया और उनके लिए प्रचार भी किया। नमो शुद्र और मुसलमानों
ने डॉक्टर अंबेडकर को वोट देकर संविधान सभा तक पहुंचाया। इसके
बाद जुलाई, 1946 में आंबेडकर
बंगाल से संविधान सभा के सदस्य बने. विभाजन के बाद आंबेडकर का निर्वाचन क्षेत्र
खुलना पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में चला गया।
वह
भारत के बंटवारे के पक्ष में नहीं थे लेकिन उन्होंने महसूस किया कि उच्च जाति के
हिंदूओं के बीच रहने से नमों शूद्रो की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। इसीलिए
उन्होंने सोचा पाकिस्तान दलितों के लिए ज्यादा बेहतर हो सकता है,
।
मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को यह यकीन
दिलाया कि वे उनके साथ जाएं और वहां पर उनका सम्मान होगा तथा दलितों के साथ
भाईचारा के साथ जिंदगी बसर होगी उनके हितों की रक्षा की जाएगी। वे पाकिस्तान चले
गये। जैसा की पूर्व में बताया गया है, उन्हे
पाकिस्तान संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया, बाद
में वे वहां के प्रथम कानून मंत्री भी बने। जिन्ना के मौत के बाद पाकिस्तान की
स्थिति बदलती गई । जम्बूरियत के बजाय वहां की सत्ता में धर्म हावी होने लगा।
पाकिस्तान के नेता एवं बड़े अफसर मंडल से भेदभाव करते थे। यहां तक की उनके कानून
मंत्री रहते उनके ही सेक्रेटरी उनकी बात नही मानते थे। उन्होने देखा पाकिस्तान
में हिन्दू दलितों के साथ ज्यादती हो रही है। शासन द्वारा रोक थाम के लिए कोई
कदम नही उठाया जा रहा है। यही हाल पूर्वी पाकिस्तान (बंगलादेश) का भी था। उन्होने
तत्कालीन प्रधान मंत्री चौधरी मोहम्मद अली को हिन्दू दलितों पर धार्मिक हमले की
बात बताई। कई पत्र लिखे। लेकिन कोई कदम नही उठाया गया। तंग आकर उन्होने मंत्री पद
से त्याग पत्र देकर भारत आ गये। कोलकाता के एक झोपड़ पट्टी इलाके में रहने लगे।
चूंकि बंगाल में उनकी लोकप्रियता अभी भी थी। इसलिए उनके निवास पर भीड़ लगी रहती।
लोग अपनी समस्या का समाधान करवाने ओउनके पास आवेदन लेकर जाते। वे मुख्यमंत्री
प्रधान मंत्री को पत्र लिखते पर शायद ही किसी पत्रों पर कार्यवाही होती। उन्होने
भारत में राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की बहुत कोशिश की। कई चुनाव लड़े पर वे सफल
नही हो पाये।
दोनो
तरफ से छले गये जोगेन्द्रनाथ
जोगेंद्र
नाथ मंडल जिस हिन्दू जाति व्यवस्था ऊंच नीच, भेदभाव,
जातीय
प्रताड़ना से तंग आकर समता समानता, बराबरी
पाने की आशा में मुस्लिम लीग की ओर गए।
लेकिन वहां पर भी उन्हें शिवाय धोखे के कुछ न मिला। उनके साथ बहुत सारे हिंदू दलित
भी पूर्वी पाकिस्तान चले गए। उनके साथ बहुत जुल्म हुए, अत्याचार
की सीमा नहीं रही, हत्याएं
बलात्कार का सिलसिला चलता रहा। पाकिस्तान से उन्हें भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। अंत
में गुमनामी की जिंदगी गुजारते हुए 5 अक्टूबर 1968 मे उनकी मौत हो गई। उनकी मौत पर
किसी भी बड़े नेता ने उन्हें याद नहीं किया।
उनकी
मौत पर बहुत सारे सवाल खड़े हुए जोगेंद्र नाथ मंडल के बेटे जगदीश मंडल ने कहा कि
उनकी मौत स्वाभाविक नहीं थी उन्होंने हत्या की आशंका व्यक्त कि। बहरहाल जोगेंद्र
नाथ की जिंदगी पर नजर डालें तो यह बात सामने खुलकर आती है की दलित समुदाय का
हितैषी आखिर कौन है क्यों जिनके सहारे वे पाकिस्तान गए उन लोगों ने ही उनका साथ
नहीं दिया। प्रश्न यह भी उठता है कि भारत
के बड़े नेता होने के बावजूद क्यों वे यहां भी भेदभाव का शिकार होते रहे हैं?
प्रश्न
यह है कि आखिर वंचित समाज का हितैषी कौन है क्यों वंचित समाज के लोग हर जगह छले
जाते हैं। इस प्रश्न का जवाब ढूंढना होगा।

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