Wednesday, 31 December 2025

Did Muslim invaders convert all Buddhists into Muslims?

 क्‍या मुस्लिम आक्रांताओं ने सारे बुध्दिस्‍टों को मुसलमान बना दिया?

संजीव खुदशाह

आज हम भारत में हिन्‍दू मुस्‍लिम संघर्ष कई माध्‍यम से देख रहे है। ऐसा ही माहौल कभी बुध्दिस्‍ट और मुसलमानों के बीच भी था। आज यदि मयामांर और श्रीलंका पर नजर दौड़ाये तो हमें मुस्लिम और बौध्‍दो के बीच ऐसा ही संघर्ष दिखाई पड़ता है। आज हम इरान ईराक अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान पर ध्‍यान केन्‍द्रीत करे तो ज्ञात होता है कि कभी यह स्‍थान बौध्‍द क्षेत्र था यहां की बहुसंख्‍यक आबादी बुध्दिस्‍ट थी। यह एक अध्‍ययन का विषय है कि ऐसा क्‍या हुआ की यहां की बौध्‍द लोगों ने मुस्लिम धर्म स्‍वीकार कर लिया। ऐसा क्‍यों हुआ की जिन लोगों के पूर्वजों ने बामियांन की बौध्‍द प्रतिमाओं का निर्माण किया उन्‍ही लोगों ने मुस्लिम धर्म के प्रभाव में आकर उन प्रतिमाओं को तोड़ दिया। यहां कोई बौध्‍द प्रतिकार करने के लिए नहीं रह गया सभी मुसलमान मन गये या वहां से भाग गये।

इसके कई कारण है इस पर हम बाद में विचार करेगें उससे पहले यह बात करना जरूरी है कि मुस्लमानों की आबादी किन धर्म में कब्‍जा करके बढ़ाई गई।

मुस्लिम धर्म के शुरुआती दिनों का अध्‍ययन करे तो ज्ञात होता है कि उस समय वहां इसाई धर्म का काफी प्रभाव था। यह प्रभाव इस्‍लाम की मुख्‍य किताब कुरआन शरीफ पर दिखता है। शुरूआत में मुसलमानों और इसाइयों के बीच संघर्ष हुये इसका जिक्र धार्मिक और ऐतिहासिक किताबों में मिलता यह युध्‍द आज भी चल रहा है क्‍योंकि इसा को मानने वाले बड़ी ताताद में मौजूद है। यरूसलम का संघर्ष इसलाम के शुरुआती दिनो से अब तक जारी है।

इसी प्रकार का संघर्ष मुसलमानों का बौध्दिस्‍टों के बीच भी चला लेकिन बौध्‍द इस्‍लाम के आगे टि‍क नहीं पाये वे मुस्लिम हो गये। बुत परस्‍ती शब्‍द असल में बुध्‍द शब्द से ही बना है। इस्‍लाम के प्रारंभ होने के पहले जिस तरह-तरह के देवी देवताओं मुर्तियों का जिक्र होता है वे शायद बुघ्दिस्‍ट मुर्तियां रही होगी। या फिर अलग अलग कबीले समाज के देवी देवता रहे होगे। जो भी हो काफीर शब्‍द भी बुध्दिस्‍टों के लिए प्रयोग किया जाता रहा है।

इस्‍लाम का धर्म की शुरूआत 7वी शताब्‍दी याने 613 इसवी में हुई थी। ठीक इसके 100 वर्ष बाद यानि 712 इसवी में मुहम्मद बीन कासि‍म ने सिंध पर आक्रमण कर भारी तबाही मचाई और लाशों के ढेर लगा दिए। इस युद्ध में अरबों ने सिंध पर जीत हासिल की और इस तरह से पहली बार भारत में इस्लाम धर्म का आगमन हुआ. फारसी ग्रंथ चचनामा में अरबों की सिंध पर जीत की जानकारी मिलती है। इस समय राजा दाहीर (सिंधी राजा) का शासन था वो इस लड़ाई में मारा गया।

चचनामा के अनुसार मुहम्‍मद बीन कासिम ने भारत के राजाओं का पत्र लिखा की या तो इस्‍लाम धर्म अपना ले या आत्म समर्पण कर दे। इसी चचनामा में एक स्‍थान पर जिक्र मिलता है कि जब मुहम्‍मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया तो दाहिर के किले से एक ब्राम्‍हण बाहर निकला और उची अवाज में कहा मैं ज्‍योतिष हूँ तुम्‍हारा भविष्‍य जान चुका हूँ इस्‍लामी लश्‍कर की सिन्‍ध पर विजय होगी। सारे काफीर भाग निकलेगें परन्‍तु इस मंदिर(बौध्‍द)[1] में एक मायाजाल है। जब तक मंदिर अपनी जगह कायम है आपके लिए किले में कब्‍जा करना असंभव है। आप कोशिश करके मंदिर को तोड़ दे इसके पश्‍चात ही आपकी सफलता की संभावना हो सकती है। इसी चचनामा में उस ब्राम्‍हण का नाम सोदेव (शददेव) बताया गया है। पृष्‍ठ क्रमांक 69 चचनामा का हिन्‍दी अनुवाद

इसी किताब के पेज नं 131 में यह जिक्र मिलता है कि ब्राम्‍हणों की इस वफादारी का इनाम मुहम्‍मद बीन कासिम ने दिया और ब्राम्‍हणों की समाजिक श्रेष्‍ठता उनके राजकीय ओहदे को बरकरार रखा। जिसकी मांग ब्राम्‍हणों ने उनसे की थी। साथ ही यह पहली ऐतिहासिक घटना मिलती है जिसमें मुस्लिम शासक द्वारा बौध्‍द मंदिरों को बरबाद किया गया। इस प्रकार मुसलमान शासक बख्तियार खिलजी ने सन 1199 में नालंदा विश्‍वविद्यालय को जलाकर नेस्‍त नाबूत कर दिया । हलांकि प्रो डी एन झा का मानना है की बख्तियार खिल्‍जी कभी नालंदा नहीं गया। हिन्‍दु कट्टरवादियों ने नालंदा को जलाकर नष्‍ट कर दिया क्‍योकि वे बौध्‍द विचारो से खफा थे।

बाबा साहेब डा अंबेडकर संपूर्ण वांडमय खंड 7 क्रांति प्रतिक्रांति पृष्‍ठ क्रमांक 104 में डॉं बी आर अंबेडकर लिखते है कि[2]

 इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में बौद्ध धर्म का पतन मुसलमानों के आक्रमण के कारण हुआ था। इस्लाम 'बुतके शत्रु के रूप में प्रकट हुआ। 'बुतशब्दजैसा कि लोग जानते हैअरबी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ मूर्ति है। बहुत को यह पता नहीं है कि 'बुतशब्द की व्युत्पत्ति कहां से हुई है। 'बुतशब्द अरबी भाषा में बुद्ध का बिगड़ा हुआ रूप है। इस प्रकार इस शब्द की व्युत्पत्ति से यह पता चलता है कि मुसलमान विचारकों की दृष्टि में मूर्तिपूजा और बौद्ध धर्मदोनों एक-दूसरे के पर्याय है। मुसलमानों के लिए मूर्तिपूजा तथा बौद्ध धर्म एक जैसे ही थे। इस प्रकार मूर्ति भंजन करने का लक्ष्यबौद्ध धर्म को नष्ट करने का लक्ष्य बन गया। इस्लाम ने बौद्ध धर्म को केवल भारत में ही नष्ट नहीं कियाबल्कि वह जहा भी गयावहीं उसने बौद्ध धर्म को मिटाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। इस्लाम धर्म के अस्तित्व में आने से पहले बौद्ध धर्म बैक्ट्रियापार्थियाअफगानिस्तानगांधार तथा चीनी तुर्किस्तान का धर्म था और एक प्रकार से यह धर्म समूचे एशिया में फैला हुआ था।[3] इन सब देशों में इस्लाम ने बौद्ध धर्म को नष्ट किया। जैसा कि विन्सेंट स्मिथ[4]  ने कहा है:

"मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक स्थानों पर जो भीषण हत्याकांड किए वे रूढ़िवादी हिंदुओं द्वारा किए गए अत्याचारों से कहीं अधिक प्रबल थे और भारत के कई प्रांतों से बौद्ध धर्म के लुप्त होने के लिए भारी जिम्मेदार है।"

वे आगे कहते है कि

इस स्पष्टीकरण से सब लोग संतुष्ट नहीं होंगे। यह पर्याप्त नहीं लगता। इस्लाम ने ब्राह्मणवाद तथा बौद्ध धर्मदोनों पर आक्रमण किया। यह पूछा जा सकता है कि उनमें से एक जीवित क्यों रहा और दूसरा नष्ट क्यों हो गयायह तर्क युक्तिसंगत तो लगता हैपरंतु इससे उक्त सिद्धांत का खंडन नहीं होता। ब्राह्मणवाद जीवित रहा तथा उसका अस्तित्व बना रहा। इस बात को स्वीकार करने का अभिप्राय यह नहीं है कि बौद्ध धर्म का पतन इस्लाम की तलवार की धारअर्थात उनके आक्रमणों के कारण नहीं हुआ। इसका अभिप्राय केवल यह है कि उस समय कुछ ऐसी परिस्थितियां थींजिनके कारण इस्लाम के आक्रमण के सामने ठहरना व जीवित रहना ब्राह्मणवाद के लिए तो संभव थालेकिन बौद्ध धर्म के लिए असंभव हो गया था।

जो लोग इस विषय पर और अधिक विचार करेंगेउनको यह पता चलेगा कि उस समय तीन ऐसी विशेष परिस्थितियां थींजिन्होंने मुस्लिम आक्रमणों के संकट के सामने ब्राह्मणवाद को टिका व बने रहना संभव और बौद्ध धर्म के लिए असंभव बना दिया था। पहली बात तो यह है कि मुस्लिम आक्रमणों के समय ब्राह्मणवाद को राज्य की सहायता व समर्थन प्राप्त था। बौद्ध धर्म को ऐसी कोई सहायता व समर्थन प्राप्त नहीं था। तथापि जो बात अधिक महत्वपूर्ण हैवह यह है कि ब्राह्मणवाद को राज्य की सहायता व समर्थन तब तक प्राप्त रहाजब तक इस्लाम एक शांत धर्म के रूप में विकसित नहीं हुआ और उसके अंदर मूर्तिपूजा के विरुद्ध एक लक्ष्य के रूप में प्रारंभ में उन्माद की जो ज्वाला जल रही थीवह समाप्त नहीं हुई। दूसरी बात यह है कि इस्लाम की तलवार ने बौद्धों के पौरोहित्य को बुरी तरह नष्ट कर दिया और उसे फिर से जीवित नहीं किया जा सका। इसके विपरीत ब्राह्मणवादी पौरोहित्य को मिटाना व नष्ट करना इस्लाम के लिए संभव नहीं हुआ। तीसरी बात यह है कि भारत के ब्राह्मणवादी शासकों ने बौद्ध जनसाधारण पर अत्याचार किए। उनके इस अत्याचार व उत्पीड़न से बचने के लिए भारत के बौद्ध लोगों को बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम को अंगीकार करना पड़ा और उन्होंने बौद्ध धर्म को सदा के लिए छोड़ दिया।

इनमें से कोई भी ऐसा तथ्य नहीं हैजिसकी पुष्टि इतिहास न करता हो ।

इसी खण्‍ड के पृष्‍ठ क्रमांक 107 पर डॉं बी आर अंबेडकर लिखते है कि[5]

मुसलमान आक्रमणकारियों ने जिन बौद्ध विश्वविद्यालयों को लूटाइनमें कुछ नाम नालंदाविक्रमशिलाजगदलओदंतपुरी के विश्वविद्यालय हैं। उन्होंने बौद्ध मठों को भी तहस-नहस कर दियाजो सारे देश में स्थित थे। हजारों की संख्या में भिक्षु भारत से बाहर भागकर नेपालतिब्बत और कई स्थानों में चले गए। मुसलमान सेनापतियों ने बहुत बड़ी संख्या में भिक्षूओं को मौत के घाट उतार दिया। बौद्ध भिक्षुओं को मुसलमान आक्रमणकारियों ने अपनी तलवार से किस प्रकार नष्ट किया. उसका वर्णन स्वयं मुस्लिम इतिहासकारों ने किया है। मुसलमान सेनापति ने बिहार में सन् 1197 में अपने आक्रमण के दौरान बौद्ध भिक्षुओं की किस प्रकार हत्याएं कींइसका संक्षिप्त वर्णन करते हुए विन्सेंट स्मिथ लिखते हैं:

‘’बार-बार लूटमार और आक्रमणों के कारण बिहार में जिस मुसलमान सेनापति का नाम पहले ही आंतक बन चुका थाउसने एक झटके में ही यहां राजधानी पर कब्जा कर लिया। लगभग उन्हीं दिनों एक इतिहासकार की भेंट सन् 1243 में आक्रमण करने वाले दल के एक व्यक्ति से हुई। उससे उसको यह पता चला था कि बिहार के किले पर केवल दो सौ घुड़सवारों ने बेखटकेनिधड़क होकर पिछले द्वार से धावा बोला और उस स्थान पर अधिकार कर लिया था। उन्हें लूट में भारी मात्रा में माल मिला और सिर मुंडे ब्राह्मणों अर्थात बौद्ध भिक्षुओं की इस प्रकार से हत्या करके उनका सफाया कर दिया था कि जब विजेता ने मठों व विहारों के पुस्तकालयों में पुस्तकों की विषय-वस्तु को समझाने व स्पष्ट करने के लिए किसी योग्य व सक्षम व्यक्ति की तलाश कीतो ऐसा कोई भी जीवित व्यक्ति नहीं मिला जो उनको पढ़ सकता। हमें यह बताया गया कि बाद में यह पता चला था कि समूचा दुर्ग तथा नगर एक महाविद्यालय (कालिज ) था हिंदी भाषा में महाविद्यालय को वे बिहार कहते थे।‘’ (अर्ली हिस्‍ट्री आफ इंडियां 1924 पृ 419-20)

डॉं अंबेडकर आगे कहते है कि हिन्‍दू धर्म क्‍यों बचा रहा बौध्‍द धर्म क्‍यों नष्‍ट हो गया[6]

ब्राह्मण धर्म विनाश के गर्त में डूबने से क्यों बच गया और बौद्ध धर्म क्यों नहीं बच सकाइसका कारण यह नहीं है कि बौद्ध धर्म की अपेक्षा ब्राह्मण धर्म में कोई श्रेष्ठता अंतर्निहित रही। इसका कारण उसके पुरोहितों का विशिष्ट चरित्र रहा। बौद्ध धर्म इसलिए समाप्त हुआक्योंकि उसके पुरोहितों का वर्ग ही नष्ट हो गया था और उसे फिर से जीवित करना संभव नहीं था । यद्यपि ब्राह्मण धर्म पराजित हो गया थापरंतु वह पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। प्रत्येक जीवित ब्राह्मण पुरोहित व पुजारी बन गया था और उसने अपने पूर्वज प्रत्येक ब्राह्मण पुरोहित का स्थान ग्रहण कर लिया था।

इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि बौद्ध धर्म के पतन का एक कारणबौद्ध लोगों द्वारा इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लेना भी था।

यानि अफगानिस्‍तान पाकिस्‍तान श्रीलंका मयामार तथा भारत के ज्‍यादातर मुस्लिम पहले बौध्‍द थे। डॉं अंबेडकर प्रो सेन के हवाले से लिखते है कि

आज पंजाब कश्‍मीर बिहार शरीफ के आसपास के जिले उत्‍तर पूर्वी बंगाल जहां मुसलमानों की अब प्रधानता  व बहुतायत है मुसलमानों से पहले शक्तिशाली बौध्‍द केन्‍द्र थे। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि बौध्‍दों ने हिन्‍दुओं की अपेक्षा राजनीतिक प्रलोभनों के सामने आसानी से हार मान ली और उन्‍होने धर्म परिवर्तन अपनी राजनीतिक प्रतिष्‍ठा व स्थिति में वृध्दि की संभावनाओं के कारण किया था।[7]

इस अध्‍याय के अंत में डॉं अंबेडकर लिखते है कि 

इसलिए अब कोई संदेह नहीं रह जाता कि बौद्ध धर्म के पतन का कारण बौद्धों द्वारा इस्लाम धर्म को अंगीकार करना था। यह मार्ग उन्होंने ब्राह्मणवाद के अत्याचार व क्रूरता से बचने के लिए अपनाया था। यद्यपि प्रमाण इस निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करतेपर कम से कम इसकी संभावना अवश्य दर्शाते हैं। उस समय यदि कोई संकट थातो यह ब्राह्मणवाद के कारण था।[8]

इसी प्रकार प्रो के टी एस सराओं जो की बौध्‍द अध्‍ययन विभाग दिल्‍ली विश्‍विविद्यालय के प्रोफेसर अपनी किताब प्राचीन भारतीय बौध्‍द धर्म उद्भव स्‍वरूप और पतन में बौध्‍द धर्म के पतन के लिए आंतरिक कारण को महत्‍वपूर्ण मानते है वे कहते है की

कभी-कभी ब्राम्‍हणों के वैर भाव को बौध्‍द धर्म के पतन का उत्‍रदायी माना जाता है। यह कहा जाता कि ब्राम्‍हणों ने बौध्‍दों को सामान्‍यत: धृणा की दृष्टि से देखा। हालांकि निश्चित तौर पर इसके उदाहरण है कि बौध्‍द भिक्षुओं पर अत्‍याचार हुए या वे उपहास के पात्र बनेया कभी कभी वे मार भी डाले गयेलेकिन यह बैर किसी दूसरे प्रकार का था। यदि बुध्‍द से ब्राम्‍हण समाज ने धृणा की होती तो उसी समाज ने उन्‍हे विष्‍णु के अवतार के रूप में न स्‍वीकारा होता।[9]

हांलाकि उनके इस तर्क से सहमत नहीं हुआ जा सकता क्‍योंकि बौध्‍द धर्म को पचाने के लिए उन्‍होने बुध्‍द को विष्‍णु का अवतार बनाया ये उनकी साजिश थी।

वे इसी किताब के पृष्‍ठ क्रमांक 139 पर  यह बात स्‍वीकार करते है कि मुस्लिम आक्रमण बौध्‍द धर्म के भारत की मुख्‍य भूमि से विलुप्‍त होने का मुख्‍य कारण थे। यहां उन्‍होने उन्‍ही तर्को का उपयोग किया जिसे डॉं अंबेडकर ने दिया है।

बौध्‍द धर्म के लोगो ने तेजी से अपने धर्म छोड़ कर ज्‍यादातर मुस्लिम बन गये कुछ हिन्‍दु बन गये यह बौध्‍द धर्म का पतन था इसके लिए प्रो के टी एस सराओं के निम्‍न लिखित तर्क से सहमत हुआ जा सकता है।

1 इसके संस्‍थापक गौतम बुध्‍द ने अपने अनुयायियों को दूसरे धार्मिक संप्रदायों वशेषकर मुख्‍य ब्राम्‍हणवादी धारा से अलग समुदाय के रूप में पहचान नहीं दी।

2 मठों की बर्बादी और उनके अपसर्जन से उपर से पतन शुरू हुआ। सबसे प्रमुख कारण इसमें नगरीकरण का पतन प्रतीत होता है जिससे बौध्‍द धर्म की मठ-व्‍यवस्‍था अपरिहार्य रूप से जुड़ी थी।

तर्क जो भी लेकिन इस बात की ओर इतिहास इशारा करता है कि इरान इराक अफगानिस्‍तान पाकिस्‍तान मयामार भारत श्रीलंका कभी बौध्‍द बहुल क्षेत्र थे तो अब मुस्लिम क्षेत्र कैसे बन गये जाहिर है ये मुस्लिम अरब से नहीं आये यही के बौध्‍द रहे होगे।

उपरोक्‍त तमाम तर्को से यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि

1.      मुस्लिम शासको का दुनिया को जीतने के पीछे मुख्‍य लक्ष्‍य मुस्लिम धर्म का विस्‍तार रहा है। क्‍यांकि ये धार्मिक कार्य का हिस्‍सा है।

2.      मुस्लिम एक संगठित धर्म है जिसमें पांच फर्ज है साहदानमाजरोजा, जकात, हज । इसका पालन करना हर मुस्लिम के लिए जरूरी है। जबकि ऐसा कोई कठोर नियम बौध्‍दो और हिन्‍दुओं में नहीं है।

3.      मुस्लिम धर्म में दुनिया के स‍भी मुस्‍लमानों को एक माना जाता है। जबकि बौध्‍द एवं हिन्‍दू धर्म में ऊंच-नीच भेद-भाव, जाति-संप्रदाय में बटे है। यहां धर्म से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण जाति है। ब्राम्‍हण शददेव ने चचनामा के विवरण के अनुसार मुहम्‍मद बीन कसिम से‍ अपने धर्म को नहीं बल्कि अपनी जाति को बचाया।

आश्‍चर्य तो तब होता है जब स्‍वात घाटी के क्यूरेटर फैज-उर रहमान कहते हैं कि यहां बौद्ध धर्म को पसंद करने वाले मौलवियों का स्वागत है. उनके मुताबिक, "इस्लाम से पहले यही तो हमारा धर्म था."[10] । कई साल तक पाकिस्तान की स्वात घाटी तालिबान के कब्जे में रही. इस दौरान उन्होंने इस इलाके की ऐतिहासिक पहचान और संस्कृति को तहस नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इससे स्वात में बुद्धिज्म के विशेषज्ञ परवेश शाहीन जैसे लोगों को बहुत चोट पहुंची. एक समाचार एजेंसी से बातचीत को दौरान परवेश हाशमी कहते हैं कि ऐसा लगा जैसे उन्होंने मेरे पितामेरी संस्कृति और इतिहास पर हमला किया।[11]

याने मुसलमान भी इस बात को स्‍वीकारते है कि इस्‍लाम से पहले बौध्‍द ही उनका धर्म था। कहीं न कहीं उनका जुड़ाव सांस्‍कृतिकसामाजिकभगौलिक रूप से अब भी है।



[1] अन्‍य अनुवाद में बौध्‍द विहार या बौध्‍द मंदिर बताया गया है।

[2] बाबा साहेब डा अंबेडकर संपूर्ण वांडमय खंड 7 क्रांति प्रतिक्रांति पृष्‍ठ क्रमांक 104 लेखक डॉं बी आर अंबेडकर प्रकाशन अंबेडकर प्रतिष्‍ठान सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्‍ली

[3]  आधुनिक अनुसंधानों से पता चलता है कि बौद्ध धर्म यूरोप में फैल गया था और ब्रिटेन में सैल्ट बौद्ध थे। देखिए डोनाल्ड ए. मैकेंजी की पुस्तक बुद्धिज्म इन प्री क्रिश्चियन ब्रिटेन

[4] अर्ली हिस्ट्री आफ इंडिया (1924)

 

[5] बाबा साहेब डा अंबेडकर संपूर्ण वांडमय खंड 7 क्रांति प्रतिक्रांति पृष्‍ठ क्रमांक 107 लेखक डॉं बी आर अंबेडकर प्रकाशन अंबेडकर प्रतिष्‍ठान सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्‍ली

[6] बाबा साहेब डा अंबेडकर संपूर्ण वांडमय खंड 7 क्रांति प्रतिक्रांति पृष्‍ठ क्रमांक 111 लेखक डॉं बी आर अंबेडकर प्रकाशन अंबेडकर प्रतिष्‍ठान सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्‍ली

[7] बाबा साहेब डा अंबेडकर संपूर्ण वांडमय खंड 7 क्रांति प्रतिक्रांति पृष्‍ठ क्रमांक 112-113 लेखक डॉं बी आर अंबेडकर प्रकाशन अंबेडकर प्रतिष्‍ठान सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्‍ली

[8] बाबा साहेब डा अंबेडकर संपूर्ण वांडमय खंड 7 क्रांति प्रतिक्रांति  पृष्‍ठ क्रमांक 114 लेखक डॉं बी आर अंबेडकर प्रकाशन अंबेडकर प्रतिष्‍ठान सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्‍ली

[9] किताब प्राचीन भारतीय बौध्‍द धर्म उद्भव स्‍वरूप और पतन में बौध्‍द धर्म के पतन पृष्‍ठ क्रमांक 138 लेखक प्रो के टी एस सराओं प्रकाशक हिन्‍दी माध्‍यम कार्यान्‍वय निदेशालय दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय


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