एक शूद्र तेली का भागवत कथा कहना नागवार गुजरा
संजीव खुदशाह
अब तक दलितों, आदिवासियों पर धार्मिक लोग हमले करते रहे है। यदि दलित घोड़ी पर चढ़े तो हमला, मूछे रख ले तो हमला। आदिवासी पुरोहित से पूजा न कराये तो हमला। शूद्र यानी ओबीसी इस मामले में बचा हुआ था। इसका कारण है ओबीसी का कर्मकाण्डों से जुड़ा होना। शूद्र यानी ओबीसी धार्मिक क्रियाकलापों में दान का मुख्य स्रोत भी है।


कोरोना काल मे सिरगिडी (महासमुंद) का साहू परिवार भागवत प्रवचन कराना चाहते थे। लॉक डाउन हो जाने से अनुमति नहीं मिली। तब कथावाचक पुरोहित से आग्रह करके स्थगित कर दिया गया। बाद में आयोजक ने 20 से 27 मार्च 2022 को भागवत कथा वाचन का अनुरोध किया। इस बीच संबंधित पुरोहित ने इस तिथि में व्यस्त होने की बात कहकर कथा वाचन से इंकार कर दिया। तब आयोजक परिवार ने गायत्री परिवार से जुड़ी और बीते 10 साल से प्रवचन कर रही यामिनी देवी से संपर्क कर कार्यक्रम तय किया। कथा वाचन को परंपरागत एकाधिकार मानने वाले ब्राह्मण समाज के कुछ लोगों ने पुरोहित के भड़कावे में आकर यामिनी देवी को चेतावनी देते हुए प्रवचन नहीं करने की धमकियां दी। छत्तीसगढ़ परशुराम सेना ने भी इसका विरोध किया। इससे उद्वेलित होकर यामिनी देवी ने 17 मार्च को खल्लारी थाना में रिपोर्ट दर्ज कराई है। 9 मोबाइल नंबर भी दिए हैं जिनसे उन्हें धमकियां दी गई है। पुलिस संबंधित लोगों की पतासाजी कर रही है।
.jpeg?part=0.2&view=1)
ब्राह्मणों का कहना है कि यामिनी साहू एक महिला होने के साथ साथ शूद्र यानि गैर ब्राह्मण भी है अत: सनातन धर्म संस्कृति व व्यास ऐसे लोगों के कथावाचक अधिकार स्वीकार नहीं करता है। सनातन धर्म संस्कृति में श्रेष्ठ कुल के वैदिक ब्राह्मण ही भागवत कथा या अन्य पूजा पाठ कर सकता है। इस प्रकार ब्राह्मण के अलावा यदि कोई शूद्र या गैर ब्राह्मण कथा प्रवचन या कोई भी कार्य करते है। वे अपनी अज्ञानता से धर्म संस्कृति को अपमानित करने जैसा कृत्य करते है।
वैसे तो ओबीसी हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र वर्ण में आते है। लेकिन कतिपय ओबीसी जातियां अपने आपको ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य होने का दावा करती रही है। इनके इस दावे का खंडन उच्च वर्ण समय समय पर करता रहा है।

भागवत कथा एक शूद्र महिला द्वारा कहने पर ब्राह्मणों का विरोध सही है या गलत?
गौतम धर्मसूत्र 12/6 के अनुसार शूद्र को वेद आदि भागवत रामायण कथा का श्रवण नहीं करना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है तो उसके कानों में पिघला हुआ शीशा डालने का प्रावधान है। यदि वह वाचन करता है जो उसके जीभ काटने का प्रावधान है। कंठस्थ करता है तो मार डालने का प्रावधान है।
लेकिन शूद्र यानी आज का ओबीसी इन आयोजनों का सबसे बड़ा स्रोत है। इनसे ब्राह्मणों के धर्म का अपमान नहीं होता क्योंकि इनसे भारी मात्रा में आय प्राप्त होती है। लेकिन यदि कोई ओबीसी भागवत कथा का प्रवचन करले तो धर्म का अपमान हो जाता है क्योंकि इससे उनका व्यवसाय छिन जाने का डर सताता है।
काश देश का ओबीसी समाज जागृत होता और इन कुचक्रो से अपने आप को निकालता। भागवत कथा के बजाय उन अधिकारों के लिए लड़ाई करता। जहां पर उसकी जरूरत है। प्रतिनिधित्व नगण्य है। बावजूद इसके यह घटना ओबीसी या शूद्र समाज की आंखें खोलने के लिए काफी है।
No comments:
Post a Comment